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Read in contextअध्याय ३३ ] चतुर्दशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें रुद्रकी उत्पत्तिका वर्णन ७९
तत्त्वको जानकर प्रजाओंकी रक्षा करना। सृष्टि करनेकी इच्छावाले उन महाप्रभुने चाहा—'प्रजाएँ उत्पन्न हों और इच्छानुसार जगत्की वृद्धि हो।' किंतु इसमें प्रतिबन्ध पड़ गया। अतः क्रोधसे उनका मन क्षुब्ध हो उठा। फिर वे समाधिस्थ हो गये। अब उनके सामने एक ऐसा श्रेष्ठ पुरुष प्रकट हुआ, जिसका अन्तःकरण अत्यन्त पवित्र था। उसके रजोगुण और तमोगुण सर्वथा नष्ट हो चुके थे। उसकी कीर्ति अचल थी। उस पुरुषमें वर देनेकी पूर्ण शक्ति थी एवं अपार बल था। उसके शरीरकी कान्ति काले और लाल रंगसे सम्पन्न थी तथा नेत्र पीले रंगके थे। वह उत्पन्न होते ही रोने लगा। तब ब्रह्माजीने कहा—'त्वं मा रुद'—तुम रोओ मत। इस कारण उस पुराणपुरुषका नाम रुद्र हो गया। पुनः ब्रह्माजी बोले—'तुम एक महान् पुरुष हो ! तुममें सब कुछ करनेकी शक्ति है। तुम मेरी ऐसी सृष्टिका विस्तार करो, जिसका रूप तुम्हारे ही अनुरूप हो।'
ब्रह्माजीके इतना कहते ही वे तप करनेके विचारसे जलके भीतर चले गये। फिर उन देवेश्वर रुद्रके जलमें चले जानेपर ब्रह्माजीने दक्षप्रजापतिकी सृष्टि की। ब्रह्माजीके अन्य मानस पुत्रोंने भी प्रजाओंका सृजन किया। सृष्टि पर्याप्त रूपसे फैल गयी। फिर देवेश्वरकी अध्यक्षतामें दक्षप्रजापतिका ब्रह्मयज्ञ आरम्भ हो गया।
राजन् ! इतनेमें रुद्रदेव, जो तप करनेके लिये जलके भीतर गये थे, संसार और सुरगणकी सृष्टि करनेके विचारसे जलसे बाहर निकले। उन्होंने सुना—'यज्ञ हो रहा है और उसमें देवता, सिद्ध एवं यक्ष आये हुए हैं।' फिर तो उन्हें क्रोध हो आया। अतः सोचा और कहा—'अरे, तेजस्विनी अपनी कन्या तथा मेरा तिरस्कार करके मूर्खता-वश इसने किस प्रकार जगत्की सृष्टि कर ली ? हा, हा—इसे ऐसा नहीं करना चाहिये' यों कहते-कहते रोषसे उनका शरीर चतुर्दिक् उद्दीप्त हो उठा। साथ ही उनके मुँहसे ज्वालाएँ निकलने लगीं। वे ही अनेक भूत, पिशाच, वेताल एवं योगियोंके झुंड बनकर विचरने लगीं। जब समस्त आकाश, पृथ्वी, सारी दिशाएँ तथा लोक आदि उन भूतोंसे भर गये तो उन रुद्रने सर्वज्ञताके प्रभावसे चौबीस हाथ लम्बा एक धनुष बनाया। तेहरी बटी रस्सीसे उसकी प्रत्यञ्चा बनायी और क्रोधके कारण दो दिव्य तरकस तथा बाणोंको ले लिया और उससे उन्होंने पूषाके दाँत तोड़ डाले, भग नामक मुनिकी आँखें निकाल लीं और क्रतु देवताके अण्डकोष काटकर गिरा दिये। बाणविद्ध होकर क्रतु देवता यज्ञवाट्से (यज्ञशालासे) भाग चले। वायुने उनका मार्ग रोक दिया। यज्ञ नष्ट-भ्रष्ट हो गया। देवता यज्ञके पशु-से बन गये। तब सबने भगवान् रुद्रकी शरण ली। ब्रह्माजीने वहाँ पहुँचकर रुद्रको गलेसे लगाया। वहाँ वे देवता भी उन्हें दिखायी पड़े, जिनका रुद्रने अपकार किया था और जो भक्तिके साथ उनकी शरणमें पहुँचे थे। बातें विदित हो जानेपर देवाधिदेव ब्रह्माजी रुद्रकी ओर देखते हुए बोले—'तात! अब क्रोध करना ठीक नहीं है; क्योंकि क्रतु—यज्ञदेवता तो यहाँसे भाग गये हैं।' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर रुद्र क्रोधसे भर गये और कहने लगे—'देवेश्वर ! आपने सर्वप्रथम मुझे बनाया है; किंतु ये लोग इस यज्ञमें मुझे भाग नहीं दे रहे हैं; इसीलिये मैंने इन्हें विकृत कर दिया तथा इनका ज्ञान हर लिया है।'
ब्रह्माजीने कहा—'देवताओ ! तुमलोग तथा समस्त असुर ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उच्च स्वरसे स्तोत्रोंको पढ़कर इन महाभाग शम्भुकी ऐसी आराधना करो, जिसके फलस्वरूप