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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished414 pages

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Page 82

अध्याय २८ ] नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा ७१

भी भगवान् नारायणके शरीर कहे जाते हैं। उन प्रभुने जैसी मूर्ति धारण की, उनका वैसा नाम तुम्हें बता दिया।

तदनन्तर इन मातृ-देवियोंके प्रयाससे अन्धकासुरकी रक्तधाराका प्रवाह सूख गया। उसकी आसुरी माया समाप्त हो गयी। फिर अन्धकासुर भी सिद्ध हो गया। राजन्! मैंने तुमसे यह आत्मविद्यामृत-तत्त्वका वर्णन किया है। मातृकाओंकी उत्पत्तिका यह कल्याणकारी प्रसङ्ग जो सदा सुनता है, ये माताएँ उसकी प्रतिदिन सभी प्रकार रक्षा करती हैं। राजेन्द्र! जो मुखसे इन मातृकाओंके जन्मचरित्रका पाठ करता है, वह इस लोकमें सर्वथा धन्यवादका पात्र माना जाता है। अन्तमें उसको भगवान् शिवके लोककी प्राप्ति सुलभ हो जाती है। महाभाग ब्रह्माने उन मातृकाओंके लिये उत्तम अष्टमी तिथि प्रदान की है। मनुष्यको चाहिये कि इस तिथिमें बिल्वके आहारपर रहकर भक्तिपूर्वक सदा इनकी पूजा करे। इससे परम संतुष्ट होकर ये मातृकाएँ उसको कल्याण एवं आरोग्य प्रदान करती हैं। [अध्याय २७]


नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा

राजा प्रजापालने पूछा— मुने! सृष्टिके आदिमें सूक्ष्म रूपमें स्थित निर्गुणा एवं अव्यक्त-ब्रह्मस्वरूपा कल्याणी भगवती महामाया, दुर्गा भगवती सगुण स्वरूप धारणकर पृथक् रूपमें कैसे प्रकट हुईं?

महातपाजी कहते हैं— राजन्! प्राचीन समयकी बात है। वरुणके अंशसे उत्पन्न सिन्धुद्वीप नामका एक प्रबल प्रतापी नरेश था। वह इन्द्रको मारनेवाले पुत्रकी कामनासे जंगलमें जाकर तप करने लगा। सुव्रत! इस प्रकार एक ही आसनसे भीषण तप करते हुए उसने अपने शरीरको सुखा दिया।

राजा प्रजापालने पूछा— द्विजवर! उसका इन्द्रने कौन-सा अपकार किया था, जिससे वह उनके मारनेवाले पुत्रकी इच्छासे तपमें लग गया?

महातपाजी बोले— राजन्! सिन्धुद्वीप पिछले जन्ममें विश्वकर्माका पुत्र नमुचि नामक दैत्य था, जो वीरोंमें प्रधान था। वह सम्पूर्ण शस्त्रोंद्वारा अवध्य था। अतः इन्द्रद्वारा जलके फेनसे उसकी मृत्यु हुई थी (युद्धके अन्तमें इन्द्रने उसे जलके फेनसे मारा था)। वही पुनः ब्रह्माजीके वंशमें सिन्धुद्वीपके नामसे उत्पन्न हुआ। इन्द्रके उसी वैरको स्मरणकर वह अत्यन्त कठिन तपस्या करनेके लिये बैठ गया था।

इस प्रकार बहुत समय बीत जानेपर पवित्र नदी वेत्रवती (मध्यप्रदेशकी बेतवा नदी)-ने अत्यन्त सुन्दर मानुषी स्त्रीका रूप धारणकर एवं अनेक अलंकारोंसे सज-धजकर सिन्धुद्वीप जहाँ बैठकर महान् तप कर रहा था, वहाँ पहुँची। उस सुन्दरी स्त्रीको देखकर राजाका मन क्षुब्ध हो उठा, अतः उसने पूछा—'सुन्दर कटिभागवाली भामिनि! तुम कौन हो? सब सच्ची बात बतानेकी कृपा करो।'

नदीने उत्तर दिया— मेरा नाम वेत्रवती है। मेरे मनमें आपको प्राप्त करनेकी इच्छा हो गयी है। अतः मैं यहाँ आ गयी हूँ। महाराज! इस बातपर तथा मेरे भावोंका विचारकर आप मुझ दासीको स्वीकार करनेकी कृपा करें।

राजन्! वेत्रवतीके इस प्रकार कहनेपर राजा सिन्धुद्वीपने भी उसे स्वीकार कर लिया। समय पाकर शीघ्र ही उससे पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उस बालकमें बारह सूर्यों-जैसा तेज था। वेत्रवतीके उदरसे जन्म होनेके कारण वह वेत्रासुरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसमें पर्याप्त बल था। उसके तेजकी