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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished414 pages

Page 80 of 414

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Page 80

अध्याय २७ ] अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा ६९

आपकी मूर्ति हैं। अन्धकार दूर करना आपका स्वभाव है। आप वेदान्त आदि शास्त्रोंकी सहायतासे ही जाने जाते हैं। यज्ञोंमें विष्णुके रूपसे आपके ही निमित्त हवन होता है। हम सभी देवता आपकी शरणमें आये हैं। आप प्रसन्न होकर सदा हमारी रक्षा करें। देवेश्वर! अब हमलोगोंके द्वारा भक्तिपूर्वक की हुई आपकी स्तुति सम्पन्न हो गयी। प्रभो! विशेष आग्रह है कि आप हमारी रक्षाका प्रबन्ध करें।

इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर भगवान् सूर्यने तेजोमयी मूर्तिको सौम्य बना लिया और उनके सामने शीघ्र ही साधारण प्रकाश फैलाने लगे। (उस अवसरपर देवताओंने कहा—) 'भगवन्! इस सम्पूर्ण देवगणमें बेचैनी उत्पन्न हो गयी थी। अब आपकी कृपासे सभी शान्तिका अनुभव कर रहे हैं।' (महातपा मुनि कहते हैं—राजन्!) सप्तमी तिथिके दिन भगवान् सूर्यका प्राकट्य हुआ था, अतः इस तिथिको उपवास करके जो पुरुष भक्तिपूर्वक सूर्यकी पूजा करता है, भास्कररूपधारी प्रभु उसकी इच्छाके अनुसार फल प्रदान कर देते हैं। राजन्! सूर्यसे सम्बन्धित यह कथा बहुत पुरानी है, जिसे तुम सुन चुके। अब आदि मन्वन्तरमें हुई (मातृकाओंकी उत्पत्तिसम्बन्धी) एक अन्य आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो।' [अध्याय २६]

अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा

मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! पूर्व समयकी बात है, भूमण्डलपर एक महान् पराक्रमी राक्षस था, जिसकी अन्धक नामसे ख्याति थी। ब्रह्माजीके द्वारा वर प्राप्तकर उसका अहंकार चरम सीमापर पहुँच गया था। सभी देवता उसके अधीन हो गये थे। उसकी सेवा असह्य होनेके कारण देवताओंने सुमेरु पर्वत छोड़ दिया और उस दानवके भयसे दुःखी होकर वे ब्रह्माजीकी शरणमें गये। उस समय वहाँ आये हुए प्रधान देवताओंसे पितामहने कहा—'सुरगणो! कहो, तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन है? तुम क्या चाहते हो?'

देवताओंने कहा—जगत्पते! आप चतुर्मुख एवं जगत्-पितामह हैं। भगवन्! आपको हमारा नमस्कार है। अन्धकासुरके द्वारा हम सभी देवता महान् दुःखी हैं। आप हम सबकी रक्षा करें।

ब्रह्माजी बोले—श्रेष्ठ देवताओ! अन्धकासुरसे रक्षा करना मेरे वशकी बात नहीं है। हाँ, महाभाग शंकरजी अवश्य सर्वसमर्थ हैं। हम सभी उनकी ही शरणमें चलें; क्योंकि मैंने ही उसे वर दिया था कि तुम्हें कोई भी मार न सकेगा और तुम्हारा शरीर भी पृथ्वीका स्पर्श नहीं करेगा। फिर भी उस परम पराक्रमी असुरको शत्रुओंके संहार करनेवाले भगवान् शंकर मार सकते हैं; अतः हम सबलोग उन्हीं कैलासवासी प्रभुके पास चलें।

राजन्! इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी सभी देवताओंके साथ भगवान् शंकरके पास गये। उन्हें देखकर भगवान् शंकरने प्रत्युत्थानादिद्वारा स्वागत-कर उनसे कहा—'आप सभी देवता किस कारणसे यहाँ पधारे हैं? आप शीघ्र आज्ञा दें, जिससे मैं आपलोगोंका कार्य तुरंत सम्पन्न कर दूँ।'

इसपर देवताओंने कहा—'भगवन्! दुष्टचित्त, महाबली अन्धकासुरसे आप हमारी रक्षा करें' अभी वे ऐसा कह ही रहे थे कि विशाल सेना लिये अन्धकासुर वहीं आ धमका। उस समय वह दानव पूरे साधनोंके साथ आया था। उसकी इच्छा थी कि वह युद्धमें चतुरङ्गिणी सेनाके सहारे शंकरजीको मारकर उनकी पत्नी पार्वतीका अपहरण कर ले। उसे सहसा इस प्रकार प्रहारके लिये