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Read in context| २४० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३७ |
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बन जाऊँ। अधर्ममें मेरी बुद्धि कभी न जाय और मैं ओषधियोंका भी स्वामी बन जाऊँ। महादेव! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे आनन्दित करनेके लिये यह वर देनेकी कृपा कीजिये।'
वसुंधरे! चन्द्रमाकी इन बातोंको सुनकर और उन्हें वैसा वरदान देकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया। महाभागे! चन्द्रमाने जहाँ एक पैरपर खड़े रहकर पाँच हजार वर्षोंतक महान् तपस्या की थी, वह 'सोमतीर्थ' नामसे विख्यात हुआ तथा उन्हें दुर्लभ सिद्धि एवं कान्ति प्राप्त हुई। जो मेरा भक्त इस सोमतीर्थमें श्रद्धासे स्नानकर प्रतिदिन दिनके आठवें भागमें भोजन करके मेरी उपासनामें लगा रहता है, अब उसके फलका वर्णन करता हूँ। वह पैंतीस हजार वर्षोंतक ब्राह्मणका शरीर पाता है और वेद-वेदाङ्गका पारगामी विद्वान्, धनवान्, गुणवान्, दानी एवं मेरा निर्दोष भक्त होता है और संसारसागरको पार कर जाता है। यशस्विनि! यह ऐसा महत्त्वपूर्ण तीर्थ है, जहाँ महात्मा चन्द्रमाने दीर्घकालतक तपस्या की थी।
अब उस 'सोमतीर्थ' का लक्षण बतलाता हूँ, सुनो। वैशाख शुक्ल द्वादशीको चन्द्रमाके अस्त होने एवं अन्धकारके प्रवृत्त होनेपर जहाँ बिना चन्द्रमाके ही पृथ्वीपर चन्द्रिका चमकती दीखे, उसे ही सोमतीर्थ समझना चाहिये। वास्तवमें यह महान् आश्चर्यका विषय है कि चन्द्रमाका आलोक (प्रकाश) तो दीखता है, पर स्वयं चन्द्रमा वहाँ नहीं दीखते। महाभागे! ये परम पवित्र सौकरवतीर्थ तथा सोमतीर्थ—मुझसे सम्बन्ध रखते हैं।
वसुंधरे! अब मैं एक दूसरी बात बतलाता हूँ, उसे सुनो; जिससे इस क्षेत्रकी अद्भुत महिमा प्रख्यायित होती है। यहाँ एक शृगाली रहती थी, जो बिना श्रद्धाके ही पूर्वकर्मवश दैवयोगसे मरकर इस क्षेत्रके प्रभावसे अगले जन्ममें गुणवती, रूपवती और चौंसठ कलाओंसे सम्पन्न श्यामा* सर्वाङ्गसुन्दरी राजाकी पुत्री हुई थी। उसी सोमतीर्थके पूर्वी भागमें 'गृध्रवट' नामका भी एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ एक गीधकी अनायास मृत्यु हुई, जिसकी कोई कामना न थी, पर उसे मनुष्यकी योनि प्राप्त हुई थी।
पृथ्वी बोली— प्रभो! इस तीर्थके प्रभावसे तिर्यक्-योनिमें पड़े हुए गीध और शृगाली मनुष्य-शरीरको कैसे प्राप्त हुए? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! साथ ही उस तीर्थमें स्नान करनेसे अथवा प्राणत्याग करनेसे मनुष्य किस गतिको प्राप्त करते हैं तथा उनके शरीरपर कौनसे विशेष चिह्न होते हैं? केशव! आप मुझे यह भी बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह बोले— देवि! धर्मप्रधान सत्ययुगके बाद त्रेतायुगका प्रवेश ही हुआ था। उस समय काम्पिल्य† नगरमें ब्रह्मदत्त‡ नामक एक धर्मनिष्ठ राजा रहते थे। उनका सभी लक्षणोंसे सम्पन्न एक सोमदत्त नामक पुत्र था। एक बार वह
* शास्त्रोंमें 'श्यामा' स्त्रीके अनेक रूप निर्दिष्ट हैं। (द्रष्टव्य—'वाचस्पत्य' एवं 'शब्दकल्पद्रुम' कोश अथवा 'मोनियर विलियम' का संस्कृत-अंग्रेजी कोश)। यह मुख्यतः सुवर्णके रंगकी अत्यन्त दीप्तिमती गौरवर्णकी स्त्री होती है। यथा—
श्यामा गुणवती गौरी दिव्यालंकारभूषिता। चतुरा शीलसम्पन्ना चित्तेनारुन्धती समा॥ (पुरुषोत्तममासमाहा० ३। ४५)
अथवा—'तप्तकाञ्चनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते।'
† काम्पिल्य-फर्रूखाबाद जिलेमें कायमगंजसे ६ मील, फतेहगढ़से २८ मील पूर्वोत्तर गङ्गानदीके तटपर है। यह राजा द्रुपदकी राजधानी थी। द्रौपदीका स्वयंवर यहीं हुआ था।
‡ ब्रह्मदत्तका यह चरित्र वाल्मी०रामा०बालकाण्ड, मत्स्यपुराण अध्याय १९—२१, हरिवंश १।२२—२५, शिवपुराण उमासंहिता ४१ तथा अन्यान्य पुराणोंमें भी प्राप्त होता है।