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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 243 of 414

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Page 243
२३२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३३-१३४

भी क्रिया होती होगी? अतः उसे आप बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मेरे कर्मका अनादर करनेवाले व्यक्तियोंको जो गति प्राप्त होती है, इस विषयमें मैं विचारपूर्वक कहता हूँ, सुनो। मुझसे सम्बन्धित नियमोंका ठीक रूपसे पालन न कर जो अपवित्र व्यक्ति मेरी उपासनामें लग जाता है, उसे नियमानुसार ग्यारह हजार वर्षोंतक कीड़ा होकर रहना पड़ता है, इसमें कोई संशय नहीं है। उसकी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त यह है—उसे महासांतपन अथवा तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। यशस्विनि! ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य—इनमें जो भी मेरे मतके समर्थक हैं, उन्हें इस विधिके अनुसार यह प्रायश्चित्त करना आवश्यक है। इसके फलस्वरूप पापसे छूटकर वे परम गति प्राप्त कर लेते हैं। मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाला जो व्यक्ति क्रोधमें भरकर मेरे गात्रोंका स्पर्श करता है और जिसका चित्त एकाग्र नहीं रहता, उसपर मैं प्रसन्न नहीं होता, बल्कि उसपर मुझे क्रोध ही होता है। जो सदा इन्द्रियोंको वशमें रखता है, जिसके मनमें मेरे प्रति श्रद्धा है, पाँचों इन्द्रियाँ नियमानुसार कार्य करती हैं तथा जो लाभ और हानिसे कोई प्रयोजन नहीं रखता, ऐसा पवित्र व्यक्ति मुझे प्रिय है। जिसमें अहंकार लेशमात्र भी नहीं रहता तथा मेरी सेवामें जिसकी विशेष रुचि रहती है, वह मुझे प्रिय है। अब इनके अतिरिक्त दूसरे व्यक्तियोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो मुझमें श्रद्धा-भक्ति रखता है, जो शुद्ध एवं पवित्र भी है, फिर भी यदि क्रोधके आवेशमें मेरा स्पर्श करता या मेरी परिक्रमा करता है, वह उस क्रोधके फलस्वरूप सौ वर्षोंतक चील पक्षीकी योनिमें जन्म पाता है, फिर सौ वर्षोंतक उसे बाज बनकर रहना पड़ता है और तीन सौ वर्षोंतक वह मेढकका जीवन व्यतीतकर दस वर्षोंतक राक्षसका शरीर पाता है। फिर वह इक्कीस वर्षोंतक अंधा रहकर बत्तीस वर्षोंतक गीध तथा दस वर्षोंतक चक्रवाककी योनिमें रहता है। इसमें वह शैवाल भक्षण करता तथा आकाशमें उड़ता रहता है। इस प्रकार क्रोधी उपासकोंकी दुर्गति होती है और उन्हें संसारचक्रमें भटकना पड़ता है।

पृथ्वीने कहा— जगत्प्रभो! आपने जो बात बतलायी उसे सुनकर मेरा हृदय विषाद एवं आतङ्कसे भर गया है। देवेश्वर! मैं प्रार्थना करती हूँ कि मेरी प्रसन्नताके लिये आप अखिल जगत्को सुखी बनानेवाला ऐसा कोई प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा करें, जिसका पालन करके कर्मशील विवेकी पुरुष इस पापसे मुक्त होकर शुद्ध हो सके? भगवन्! वह प्रायश्चित्त ऐसा होना चाहिये, जिसे थोड़ी शक्तिवाले तथा लोभ एवं मोहसे ग्रस्त व्यक्ति भी निर्भीकतापूर्वक सरलतासे सम्पादन कर सकें और कठिन यातनाओंसे उनका उद्धार हो जाय।

पृथ्वीके इस प्रकार प्रार्थना करनेके समय ही कमलनयन भगवान् वराहके सम्मुख योगीश्वर सनत्कुमार भी पहुँच गये। वे ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उन मुनिने पृथ्वीकी बात सुनकर भगवान् वराहकी प्रेरणासे पृथ्वीसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

सनत्कुमारजी बोले— देवि! तुम धन्य हो जो भगवान्से इस प्रकार प्रश्न करती हो। इस समय साक्षात् भगवान् नारायण ही वराहका रूप धारणकर यहाँ विराजमान हैं। सम्पूर्ण मायाकी रचना इन्हींके द्वारा हुई है। इनसे तुम्हारा क्या वार्तालाप हुआ है, उसका सारांश बतलाओ। उस समय सनत्कुमारकी बात सुनकर पृथ्वीने उनसे कहा—'ब्रह्मन्! मैंने इनसे क्रियायोग एवं अध्यात्मका रहस्य पूछा था।