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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished414 pages

Page 239 of 414

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Page 239
२२८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२९

छूटे हुए चक्रके द्वारा मेरी मृत्यु हो और इस प्रकार मेरे शरीरके गिरनेपर उससे जो कुछ भी वसा (चर्बी), मज्जा, मेदा और मांस आदि बिखरें, वे सब ताँबेके* रूपमें परिवर्तित हो जायँ तथा उसमें सबको पवित्र करनेकी शक्ति निहित हो। फिर मङ्गलमय धार्मिक कार्य करनेवाले पुरुष उस ताँबेसे आपके पात्रका निर्माण करायें। उस ताँबेके पात्रमें आपकी पूजनोपयोगी वस्तु रखकर साधक आपको निवेदित करे तथा उस अर्पित की हुई वस्तुसे आप पूर्ण प्रसन्न हों। भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे यही वर देनेकी कृपा करें।'

उस समय भगवान् नारायणने गुडाकेशसे कहा—'असुरराज! तुमने उग्र तपस्या करते समय जो कुछ भी सोचा है, वह सब वैसा ही होगा। जबतक मेरा बनाया हुआ संसार स्थित रहेगा, तबतक तुम ताम्रमय बनकर मुझमें स्थित रहोगे।' सुव्रते! उसी समयसे गुडाकेशका शरीर ताम्रमय बनकर जगत्में प्रतिष्ठित हुआ। इसीलिये ताँबेके पात्रमें रखकर जो वस्तु मुझ भगवान्‌को अर्पित की जाती है, उससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है। देवि! यही कारण है कि ताँबा मङ्गलस्वरूप, पवित्र एवं मुझे अत्यन्त प्रिय है। वसुंधरे! फिर मैंने उस असुरसे कहा कि देखो, मध्याह्नकालके सूर्यमें तुम्हें मेरे चक्रका दर्शन होगा। वैशाखमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके दिन मध्याह्नकालमें मेरा तेजोमय चक्र तुम्हारे शरीरका अन्त करेगा, जिससे तुम मेरे लोकको प्राप्त कर लोगे, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।

गुडाकेशसे यह कहकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया। उधर गुडाकेश भी मेरे चक्रद्वारा अपने वधकी प्रतीक्षा करते हुए तपस्यामें संलग्न रहा। उसके इसी प्रकार सोचते-सोचते वैशाखमासके शुक्लपक्षकी वह द्वादशी तिथि आ पहुँची। उस दिन उसने अपना धर्म निश्चय कर मेरी पूजा की और प्रार्थनामें संलग्न हो गया। फिर कहने लगा—'प्रभो! आप अग्निके समान अपने तेजोमय चक्रको छोड़िये, जिससे मेरे अङ्ग भलीभाँति छिन्न-भिन्न हो जायँ और मेरा आत्मा शीघ्र ही आपको प्राप्त कर ले।'

इस प्रकार वह गुडाकेश मेरे चक्रद्वारा विदीर्ण होकर मुझमें लीन हुआ और उसीके मांससे ताँबा उत्पन्न हुआ। उसका रक्त सुवर्ण हुआ और उसके शरीरकी हड्डियाँ चाँदी बनीं। उसकी अन्य धातु भी तैजस धातुओंके रूपमें परिवर्तित हो गयी और वे ही राँगा, सीसा, टीन, काँसा आदि बने तथा उसके मलसे अन्य प्राकृतिक खनिज—गंधक आदि द्रव्योंका प्रादुर्भाव हुआ। देवि! इसीलिये ताँबेके पात्रद्वारा मुझे चन्दन, अङ्गराग, जल, अर्घ्य, पाद्यादि अन्य वस्तुएँ अर्पण की जाती हैं। देवि! ताम्रके पात्रमें स्थित एक-एक पके चावलमें अनन्त फल भरा है। इससे श्रद्धालु पुरुषोंकी मेरी उपासनामें रुचि बढ़ती है। इस प्रकारसे उत्पन्न होनेके कारण ताम्र मुझे अधिक प्रिय है। दीक्षित पुरुष इस ताम्रपात्रसे ही पाद्य एवं अर्घ्य देते हैं। देवि! इस प्रकार मैंने दीक्षाकी विधि एवं ताँबेकी उत्पत्तिके प्रसङ्गका तत्त्वतः वर्णन किया। अब तुम दूसरी कौन-सी बात पूछना चाहती हो? वह बतलाओ।

[अध्याय १२९]


* ताँबेकी इस उत्पत्तिकी कथामें घृणाकी कोई बात नहीं है। भूमिमाता (मेदिनी)-की उत्पत्ति भी मधु-कैटभ दैत्यके मेदसे तथा सभी रत्नोंकी उत्पत्ति वलासुरकी अस्थि, वसा (चर्बी), मज्जा इत्यादिसे हुई है, यह कथा प्रायः गरुडादि सभी पुराणोंमें प्रसिद्ध है। 'द्रष्टव्य—गरुडपुराण अध्याय ६८—८०; पद्मपुराण भूमिखं० २३, उत्तर खं० ७; विष्णुधर्मोत्तरपुराण २। १५, अग्निपुराण अ० २४६ शुक्रनीति, 'बृहत्संहिता', 'शैव (शिवतत्त्व) रत्नाकर', 'युक्तिकल्पतरु', 'मानसोल्लास', (अभिलाषचिन्तामणि) आदि।