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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished414 pages

Page 236 of 414

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Page 236

अध्याय १२८ ] क्षत्रियादि दीक्षा, गणान्तिकादीक्षा तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य २२५


उत्तर तो यह है कि वस्तुतः दीक्षित व्यक्तिको निरन्तर एकमात्र मेरा ही चिन्तन करना चाहिये। महाभागे! 'गणान्तिकादीक्षा' का रहस्य अत्यन्त गोपनीय वस्तु है और इसे मेरा ही स्वरूप समझना चाहिये। विशालाक्षि! मेरी भक्तिमें लगे रहनेवाले दीक्षित पवित्रात्मा व्यक्तिको विधिपूर्वक मन्त्रके द्वारा इसे ग्रहण करना चाहिये। जो भगवद्भक्त होकर इस दृष्टिजनित या स्पर्शजनित* गणान्तिकादीक्षाको ग्रहण करता है, उसके लिये और कोई कर्तव्य कार्य शेष नहीं रह जाता। उसके लिये दीक्षा ही सर्वफलदायिका होती है। किंतु सुन्दरि! जो व्यक्ति केवल कानसे ही सुनकर मन्त्रोंकी दीक्षा ग्रहण करता है, उसे 'आसुरी-दीक्षा' कहते हैं। अतएव पवित्र मनवाले पुरुषको चाहिये कि मुझसे सम्बन्धित गुह्य दीक्षा ग्रहण करे। जो बुद्धिमान् पुरुष इस दीक्षाके सहारे मेरा ध्यान-स्मरण करता है, उसने मानो हजारों जन्मोंतक मेरा ध्यान-चिन्तन कर लिया—ऐसा समझना चाहिये।

वसुंधरे! इस 'गणान्तिकादीक्षा' के लिये कार्तिक, मार्गशीर्ष और वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथियाँ प्रशस्त हैं। दीक्षाकी बात निश्चित हो जानेपर उसे तीन दिनोंतक शुद्ध आहारपर रहना चाहिये। फिर मेरे धर्मपर अटल विश्वास रखकर उचित समयमें दीक्षा लेनी चाहिये। सुशोभने! साधक पुरुष मेरे सामने अग्नि प्रज्वलित कर कुशका परिस्तरण करे। फिर भावनामयी 'दीक्षा' की स्थापना करे। तत्पश्चात् शिष्य देव-भावनासे परम पवित्र होकर दीक्षाके कार्यमें संलग्न हो जाय। उस समय 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर यह मन्त्र पढ़े। मन्त्रका भाव है—'शिष्य! यह दीक्षा भगवान् नारायणके दाहिने अङ्गसे प्रकट हुई है। उनकी कृपासे ही पितामह ब्रह्माने इसे धारण किया है, वही दीक्षा तुम भी ग्रहण करो।' इसके बाद स्नानकर रेशमी वस्त्र धारणकर वह मेरे अङ्गोंका स्पर्श करे। फिर उसी समय कंघी और अञ्जन समर्पण कर मुझ भगवान् नारायणको मन्त्रसे स्नान कराये। मन्त्रका भाव यह है—'देवेश्वर! स्नान करनेके लिये यह जल सुवर्णके कलशमें रखकर आपकी सेवामें समर्पित है। मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहा हूँ, आप इससे स्नान करनेकी कृपा करें। फिर 'ॐ नमो नारायणाय' का उच्चारण कर कहे—'माधव! आपकी कृपाके बलपर गुरुदेवकी दयासे यह मन्त्रमयी दीक्षा मुझे प्राप्त हुई है। यह दीक्षा मुझे इस योग्य बना दे कि कभी भी मेरा मन अधर्मकी ओर न जा सके।'

वसुंधरे! जो व्यक्ति इस विधिके अनुसार मेरे कर्ममें दीक्षित होता है, उसमें गुरुकी कृपासे महान् तेजका आधान हो जाता है। फलस्वरूप वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। सुन्दरि! यह दीक्षा चुगलखोर, धूर्त एवं कुत्सित शिष्यको नहीं देनी चाहिये। इसे विधिपूर्वक ग्रहण कराकर योग्य एवं सज्जन शिष्यके हाथमें एक माला देनी चाहिये। देवि! १०८ दानोंकी जपमाला उत्तम, ५४ दानोंकी मध्यम तथा २७ दानोंकी गणान्तिका माला<sup>†</sup> कनिष्ठ कही गयी है। रुद्राक्षकी माला परमोत्तम


* 'कुलार्णव' (१४।५४, ५६) तथा 'श्रीविद्यार्णव' (१३।७।१—३)-में ये दीक्षाएँ इस प्रकार निर्दिष्ट हैं—

हस्ते शिवं परं ध्यात्वा जपन् मूलाङ्गमलिनीम्। गुरुः स्पृशेच्छिष्यतनुं स्पर्शदीक्षा भवेदियम् ॥
निमील्य नयने ध्यात्वा परतत्त्वं प्रसन्नधीः। सम्यक् पश्येद् गुरुः शिष्यं दृग्दीक्षा सा भवेत् प्रिये ॥

अर्थात् अपने हाथमें परम शिव एवं गुरुका ध्यान तथा 'मालिनीविद्या' का जप करते हुए जो आचार्य अपने शिष्यका स्पर्श करते हैं, वह 'स्पर्शदीक्षा' तथा नेत्रोंको बंदकर परतत्त्वका ध्यानकर शिष्यको भली प्रकार देखना 'दृग्दीक्षा' है। 'मालिनीविद्या'का वर्णन 'अग्निपुराण' के १४५वें अध्यायमें है।

<sup>†</sup> जैनधर्ममें इसका नाम 'गणितीया माला' है।