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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

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Page 214

अध्याय १२४ ] वसन्त आदि ऋतुओंमें भगवान्की पूजा करनेकी विधि और माहात्म्य [ २०३

कर्ममें संलग्न रहनेवाला पुरुष, इन गन्ध-पुष्पोंको मुझे देता हुआ जो फल प्राप्त करता है, वह यह है कि उसका न पुनर्जन्म होता है और न मरण। उसके पास ग्लानि और क्षुधा भी नहीं भटक पाती। वह देवताओंके वर्षसे एक हजार वर्षतक मेरे लोकमें स्थान पाता है। चन्दनयुक्त एक-एक पुष्प अर्पित करनेका ऐसा फल है।

[अध्याय १२३]


वसन्त आदि ऋतुओंमें भगवान्की पूजा करनेकी विधि और माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! फाल्गुन मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन पवित्र होकर शान्त मनसे भगवान् श्रीहरिकी पूजा करनेका विधान है। इस वसन्त ऋतुमें क्रमशः कुछ श्वेत, कुछ पाण्डुरङ्गके जो अत्यन्त प्रशंसनीय गन्धसे युक्त सुन्दर पुष्प हैं, उनके द्वारा प्रसन्न-अन्तःकरण होकर मन्त्रद्वारा पूजा करनी चाहिये। सभी वस्तुएँ भगवान्‌से सम्बन्ध रखनेवाली एवं पवित्र हों। पूजाके पहले ‘ॐ नमो नारायणाय’ कहकर बादमें यह मन्त्र पढ़े*—जिसका भाव है, 'देवेश्वर! आप ॐकारस्वरूप हैं। शङ्ख, चक्र एवं गदासे आपकी भुजाएँ शोभा पाती हैं। जगत्प्रभो! आप महान् पराक्रमी पुरुष हैं। आपके लिये मेरा बारंबार नमस्कार है। प्रभो! वसन्त-ऋतुमें वृक्ष फूलोंसे लदे हैं। सर्वत्र गन्धयुक्त रस भरा है। अब आप इस पुष्प-युक्त वृक्ष, वन और पर्वतों तथा मुझपर अपनी कृपादृष्टि डालनेकी दया कीजिये।

सुमध्यमे! जो पुरुष फाल्गुन मासमें इस प्रकार मेरी पूजा करता है, उसे दुःखमय संसारमें आनेका संयोग नहीं प्राप्त होता, अपितु वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। अब तुम जो श्रेष्ठ वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके फलकी बात मुझसे पूछ चुकी हो, उसे कहता हूँ, सुनो। शालवृक्ष तथा अन्य भी बहुत-से वृक्ष जब फूलोंसे परिपूर्ण हो जायें तो साधक उनके फूलोंको हाथमें लेकर मेरी आराधनाके लिये तत्पर हो जाय। उस अवसरपर मेरे प्रह्लाद, नारद आदि भागवतोंको भी पूज्य मानकर पूजा करे। माधवि! ऋषिलोग वेदोंमें कहे हुए मन्त्रोंद्वारा सदा मेरी स्तुति करते हैं। अप्सराओंद्वारा गीतों, वाद्यों एवं नृत्योंसे मैं सुपूजित होता रहता हूँ। अलौकिक दिव्य पुरुष मुझ पुराणपुरुषोत्तमका स्तवन करनेमें संलग्न रहते हैं। मैं सम्पूर्ण प्राणियोंका आराध्यदेव एवं सम्पूर्ण लोकोंका स्वामी हूँ। अतः सिद्ध, विद्याधर, किन्नर, यक्ष-पिशाच, उरग, राक्षस, आदित्य, वसु, रुद्रगण, मरुद्गण, विश्वेदेवता, अश्विनीकुमार, ब्रह्मा, सोम, इन्द्र, अग्नि, नारद-पर्वत, असित-देवल, पुलह, पुलस्त्य, भृगु, अङ्गिरा, मित्रावसु और परावसु—ये सब-के-सब मेरी स्तुतिमें सदा तत्पर रहते हैं।

उसी समय महान् ओजस्वी देवताओंके मुखसे निकली हुई प्रतिध्वनिको सुनकर भगवान् नारायणने पृथ्वीसे कहा—'महाभागे! देखो! देव-समुदाय वेदध्वनि कर रहा है। उनके मुखसे निकले हुए इस महान् शब्दको क्या तुम नहीं सुन रही हो?' इसपर पृथ्वीने भगवान् नारायणसे कहा—'भगवन्! आप जगत्‌की सृष्टि करनेमें परम कुशल हैं। देवतालोग वराहके रूपमें विराजमान आप प्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षा करते हैं, क्योंकि वे आपके द्वारा ही बनाये गये हैं।'

इसपर भगवान् नारायणने पृथ्वीको उत्तर दिया—'वसुंधरे! मैं अपने मार्गका अनुसरण


* ॐनमोऽस्तु देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर। नमोऽस्तु ते लोकनाथ प्रवीराय नमोऽस्तु ते॥ (१२४।५)