वराह पुराण
Varaha Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| १९८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२२ |
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ही इसी ‘कोकामुख’-क्षेत्रमें गिर पड़ा। किंतु आश्चर्य ! वह गिरते ही इस तीर्थके प्रभावसे रूप, गुण एवं वयसे युक्त एक कुलीन राजपुत्रके रूपमें परिणत हो गया ! कुछ समय बाद उसी व्याधकी स्त्री भी मांस लिये हुए वहाँ जा पहुँची। इतनेमें ही मांसके लिये लालायित रहनेवाली एक मादा चील भी उसके हाथसे मांस छीननेके लिये आयी, जो मांस छीननेके लिये बार-बार झपाटा मारने लगी। उसी क्षण बलपूर्वक मांस लेनेकी इच्छा रखनेवाली उस मादा चीलपर व्याधने बाण मारा, जिससे वह मेरे इस ‘कोकामुख-क्षेत्र’ में गिर पड़ी और उसके प्राण निकल गये।
तदनन्तर उस चीलने चन्द्रपुर नामक नगरमें सुन्दरी राजपुत्रीके रूपमें जन्म ग्रहण किया। उसका यश बड़ी तेजीसे चारों ओर फैलने लगा। वह कन्या धीरे-धीरे बढ़ती गयी और शनैः-शनैः रूप, गुण, अवस्था एवं सभी (चौंसठ) कलाओंके ज्ञानसे सम्पन्न हो गयी, परंतु वह पुरुषोंकी सदा निन्दा करती। उसे रूपवान्, गुणवान्, शूर-वीर तथा सौम्य स्वभावके पुरुषोंकी चर्चा भी अच्छी न लगती थी और वह उनकी भी निन्दा किया करती थी। युवती होनेपर उसका ‘आनन्दपुर’ नगरके एक शकजातिके पुरुषके साथ विवाह हुआ। विवाहके बाद दोनों पति-पत्नी गार्हस्थ्यधर्मका पालन करते हुए साथ रहने लगे। फिर वे परस्पर प्रेमके बन्धनमें इस प्रकार बँध गये कि एक मुहूर्त भी कोई किसीको छोड़ना न चाहता था। अब वही कन्या अत्यन्त नम्र होकर अपने स्वामीकी सब प्रकार सेवा करने लगी।
एक दिन मध्याह्नके समय राजकुमारके सिरमें तीव्र वेदना उत्पन्न हुई। अनेक कुशल वैद्य चिकित्सामें लगे; किंतु उसकी शिरोव्यथा दूर न हो सकी। अन्य मन्त्र-यन्त्र भी विफल हुए। इस प्रकार पर्याप्त समय बीत जानेके बाद एक दिन उस राजकुमारीने अपने स्वामीसे यह जिज्ञासा की—‘प्रभो! आपके सिरमें जो यह वेदना है, यह क्या और कैसे है ? यदि मुझपर आपका तनिक भी स्नेह हो तो आप मुझे इसे तत्त्वतः बतानेकी कृपा कीजिये। अनेक कुशल वैद्य आपका उपचार कर रहे हैं, पर उन्हें वेदना दूर करनेमें सफलता नहीं मिलती है। इसपर राजकुमारने कहा—‘भद्रे! क्या तुम यह भूल गयी कि यह मनुष्य-शरीर व्याधियोंका ही मन्दिर है? यह मनुष्य-शरीर रोग और दुःखोंसे ही भरा है, संसाररूपी सागरमें पड़े हुए मुझसे तुम्हें बार-बार ऐसा प्रश्न करना उचित नहीं है।’ राजकुमारके ऐसा कहनेपर उस राजकन्याके मनमें उत्सुकता अब और बढ़ गयी।
कुछ दिन बाद पुनः उस राजपुत्रीने अत्यन्त आग्रहपूर्वक उस प्रश्नको राजकुमारसे पूछा। इसपर शक-नरेशने अपनी भार्यासे कहा—‘भद्रे! तुम इस मानुषी भावका त्याग करो और अपने पूर्वजन्मकी बातें स्मरण करो। अथवा यदि तुम्हें पूर्वजन्मकी बातें जाननी हों तो कल्याणि! तुम चलकर मेरे माता-पिताको प्रसन्न करो। तुम उनकी पूजा करो; क्योंकि उन्होंने मुझे अपने उदरमें धारण किया था। उनका सम्मान करके और उनकी आज्ञा लेनेके पश्चात् मैं ‘कोकामुख’क्षेत्रमें चलकर तुम्हें निःसंदेह यह प्रसङ्ग सुनाऊँगा। अनिन्दिते! अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। सारा वृत्तान्त मैं तुम्हें वहीं बताऊँगा।’
तदनन्तर वह राजकुमारी अपने सास और श्वशुरके सामने गयी और उनके चरणोंको पकड़कर बोली—‘मुझे आप दोनोंसे कुछ निवेदन करना है। मैं इस विषयमें आपलोगोंसे अनुमति प्राप्त करना चाहती हूँ। फिर उसने कहा कि ‘हम दोनों स्त्री-पुरुष आपकी आज्ञासे पवित्र ‘कोकामुख’नामक