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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 205 of 414

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Page 205
१९४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ११९-१२०

भक्त इन उपचारोंसे मेरी आराधना करे। इसके परिणामस्वरूप वह सदा मेरे महान् लोकोंको प्राप्तकर वहाँ नित्य निवास करता है।
[ अध्याय ११८ ]

श्रीहरिके भोज्य पदार्थ एवं भजन-ध्यानके नियम

पृथ्वीने कहा— माधव! मैं आपके मुखारविन्दसे पूजनकी विधिका श्रवण कर चुकी। निश्चय ही इस कर्म (पूजा)-में संसारसे मुक्ति दिलानेकी सामर्थ्य है। भगवन्! अब मैं आपसे आपकी पूजाविधि एवं द्रव्योंके विषयमें कुछ जानना चाहती हूँ, आप इसे मुझे बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह बोले— वसुंधरे! जिस विधिसे पूजाकी वस्तु मुझको अर्पित करनी चाहिये, अब वह बताता हूँ, सुनो। सात प्रकारके अन्नोंको लेकर उनमें दूधका सम्मिश्रण करे। साथ ही मुझे मधूक और उदुम्बर आदिके शाक भी प्रिय हैं। माधवि! अब मेरे योग्य जो धान्य हैं, उन्हें कहता हूँ—अच्छे गन्धसे युक्त ‘धर्मचिल्लिक’ नामक शाक और लाल धानका चावल तथा अन्य उत्तम स्वादिष्ट चावल मुझे प्रिय हैं। उत्तम कुङ्कुम और मधु भी मुझे प्रिय हैं। आमोदा, शिवसुन्दरी, शिरीष और आकुल संज्ञक धानके चावल भी मेरे लिये उपयुक्त हैं। यवसे बने अनेक प्रकारके अन्न तथा शाक भी मेरे पूजनमें उपयुक्त होते हैं। मूँग, माष (उड़द), तिल, कंगुनी, कुल्थी, गेहूँ, साँवाँ—ये सभी मुझे प्रिय हैं। जब ब्रह्मयज्ञ विस्तृतरूपसे चल रहा हो, वेदके पारगामी विद्वान् यज्ञ करा रहे हों, उस समय मेरी प्रसन्नताके लिये ये वस्तुएँ मुझे अर्पण करनी चाहिये। यज्ञमें बकरी, भैंस आदि पशुओंका दूध, दही और घृत सर्वथा निषिद्ध हैं।

वसुंधरे! मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले कर्मोंमें जो वस्तुएँ योग्य हैं, उन्हें मैंने बतला दिया। मेरे भक्तोंको सुख पहुँचानेवाले उक्त पदार्थ भोज्य और कल्याणप्रद हैं। वसुंधरे! जिसे उत्तम सिद्धि पानेकी इच्छा हो, उसे इस प्रकार मेरा यजन करना चाहिये। इस विधिसे जो यजन करेंगे, वे कर्ममें कुशल पुरुष मेरी परम सिद्धि पानेके पूर्ण अधिकारी होंगे।

भगवान् वराह कहते हैं— ‘वसुंधरे! मेरा उपासक इन्द्रियोंको वशमें रखकर जो कुछ अन्न उपलब्ध हो, उसे ग्रहण करे। भामिनि! मैं नीचे-ऊपर, इधर-उधर, दिशाओं और विदिशाओंमें तथा सभी जीवोंमें सर्वत्र विराजमान हूँ। अतएव जिसे परम गति पानेकी इच्छा हो, उसे चाहिये कि सब प्रकारसे सभी प्राणियोंको मेरा ही रूप जानकर उनकी वन्दना करे। प्रातःकाल एक अञ्जलि जल लेकर पूर्वाभिमुख हो मेरी उपासना करनी चाहिये। ‘ॐ नमो नारायणाय’ यह मन्त्र जपना चाहिये। उसे यह भावना करनी चाहिये कि जो सम्पूर्ण संसारमें श्रेष्ठ हैं, जिनकी ‘ईशान’ संज्ञा है, जो आदि पुरुष हैं, जो स्वभावतया ही कृपालु हैं, उन भगवान् नारायणका हम संसारसे अपने उद्धारके लिये यजन करते हैं।’

इसके बाद पश्चिमाभिमुख होकर फिर अञ्जलि भर जल हाथमें ले। साथ ही द्वादशाक्षर वासुदेव-मन्त्र पढ़कर इस मन्त्रका उच्चारण करे—* ‘भगवन्! आप जिस प्रकार सर्वप्रथम संसारकी सृष्टि करनेवाले हैं, पुराण पुरुष हैं और परम विभूति हैं, वैसे ही आप आदि पुरुषके अनेक रूप भी हैं। आपका संकल्प कभी विफल नहीं होता। इस प्रकार


* यथा तु देवः प्रथमादिकर्त्ता पुराणकल्पश्च यथा विभूतिः। तथा स्थितं चादिमनन्तरूपममोघसंकल्पमनन्तमीडे॥ (१२०।११)

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