वराह पुराण
Varaha Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| १६६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ९१ |
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उसे अव्याहत ज्ञान होता है। नवों कलशोंसे स्नान करनेसे तो मनुष्य पापमुक्त होकर साक्षात् भगवान् विष्णुके तुल्य सर्वतः परिपूर्ण हो जाता है।
पूजाके अन्तमें गुरुकी आज्ञासे सबकी प्रदक्षिणा करे। फिर गुरुदेव प्राणायामसहित आग्नेयी एवं वारुणी-धारणाद्वारा विधिपूर्वक शिष्यका अन्तःकरण शुद्धकर उसे सोमरससे आप्यायितकर दीक्षाके प्रतिज्ञा-वचन सुनायें। इस प्रकार ब्राह्मणों, वेदों, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, आदित्य, अग्नि, लोकपाल, ग्रहों, वैष्णव-पुरुषों और गुरुके सम्मान करनेवाले पुरुषको दीक्षाद्वारा शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है।
दीक्षाके अन्तमें प्रज्वलित अग्निमें—'ॐ नमो भगवते सर्वरूपिणे हुं फट् स्वाहा'—इस सोलह अक्षरवाले मन्त्रद्वारा हवनकी विधि है। गर्भाधान आदि संस्कारोंमें जैसी हवनकी क्रियाएँ होती हैं, वैसी ही यहाँ भी कर्तव्य हैं। हवनके बाद यदि दीक्षा-प्राप्त शिष्य किसी देशका राजा हो तो वह गुरुके लिये हाथी-घोड़ा, सुवर्ण, अन्न और गाँव आदि अर्पण करे। यदि दीक्षित साधक मध्यम श्रेणीका व्यक्ति है तो वह साधारण दक्षिणा दे।
दीक्षाके अन्तमें साधक पुरुष यदि वराह-पुराण सुनता है तो उससे सभी वेद, पुराण और सम्पूर्ण मन्त्रोंके जपका फल प्राप्त होता है। पुष्कर-तीर्थ, प्रयाग, गङ्गा-सागर-सङ्गम, देवालय, कुरुक्षेत्र, वाराणसी, ग्रहण तथा विषुवयोगमें उत्तम जप करनेवालेको जो फल होता है, उससे दूना फल जो दीक्षित पुरुष इस वराहपुराणको सुनता है, उसे प्राप्त होता है। प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वी देवि! देवता लोग भी ऐसी कामना करते हैं कि कब ऐसा सुअवसर प्राप्त होगा, जब भारतवर्षमें हमारा जन्म होगा और हम दीक्षा प्राप्तकर किसी प्रकारसे षोडश-कलात्मक वराहपुराण सुन सकेंगे तथा इस देहका त्यागकर उस परम स्थानको जायँगे, जहाँसे पुनः वापस नहीं होना पड़ता।
अन्न-दानके विषयमें महात्मा वसिष्ठ एवं श्वेतका संवादात्मक एक बहुत पुराना इतिहास—सच्ची कथा कही जाती है। वसुंधरे! इलावृतवर्षमें श्वेत नामके एक महान् तपस्वी राजा थे। उन नरेशने हरे-भरे वृक्षोंवाले वनसहित यह पृथ्वी दान करनेके विचारसे तपोनिधि वसिष्ठजीसे कहा—'भगवन्! मैं ब्राह्मणोंको यह समूची पृथ्वी दान करना चाहता हूँ। आप मुझे आज्ञा देनेकी कृपा करें।' इसपर वसिष्ठजीने कहा—'राजन्! अन्न सभी समयमें (पुण्यफलके स्वरूप) सुख देनेवाला है। अतः तुम सदा अन्नदान करो। जिसने अन्नदान कर दिया, उसके लिये भूतलपर दूसरा दान कोई शेष न रहा। सम्पूर्ण दानोंमें अन्नदान ही श्रेष्ठ है। अन्नसे ही प्राणी जीवन धारण करते और बढ़ते हैं, अतः राजन्! तुम प्रयत्नपूर्वक अन्नदान करो।' किंतु राजा श्वेतने वैसा न कर बहुत-से हाथी-घोड़े, रत्न, वस्त्र, आभूषण, धन-धान्यसे पूर्ण अनेक नगर एवं खजानेमें जो धन था, उसे ही ब्राह्मणोंको बुलाकर दान किया।
एक समयकी बात है—उत्तम धर्मके ज्ञाता राजा श्वेतने सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय प्राप्त करके अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे, जो जपकर्ताओंमें सर्वोत्तम माने जाते हैं, कहा—'भगवन्! मैं एक हजार अश्वमेध-यज्ञ करना चाहता हूँ। फिर राजा श्वेतने उनकी अनुमतिसे यज्ञकर ब्राह्मणोंको बहुत-से सोना, चाँदी और रत्न दानमें दिये, किंतु उन राजाने उस समय भी अन्न और जलका दान नहीं किया; क्योंकि वे अन्न और जलको तुच्छ वस्तु समझते थे। अन्तमें कालधर्मके वश होकर जब वे परलोक पहुँचे तो वहाँ उन्हें भूख और विशेषकर प्यास सताने लगी। अतः वे अप्सराओंसहित