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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 162 of 414

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Page 162

अध्याय ९१-९२] त्रिशक्ति-माहात्म्यमें 'सृष्टि', 'सरस्वती' तथा 'वैष्णवी' देवियोंका वर्णन १५१

अंशसे उत्पन्न हुई थी, वह कल्याणमयी कुमारी तपस्या करनेके उद्देश्यसे 'नीलगिरि' पर चली गयी।

कुछ समयके पश्चात् प्रजापति ब्रह्माजी प्रजाओंकी सृष्टिमें तत्पर हुए, पर बहुत समयतक प्रयास करनेपर भी प्रजाकी वृद्धि नहीं हुई। अब वे मन-ही-मन सोचने लगे कि क्या कारण है कि मेरी प्रजा बढ़ नहीं रही है। (भगवान् वराह पृथ्वीसे कहते हैं) सुव्रते! अब ब्रह्माजीने योगाभ्यासके सहारे अपने हृदयमें ध्यान लगाया तो श्वेतपर्वतपर स्थित 'सृष्टि' कुमारीकी तपस्याकी बात उनकी समझमें आ गयी। उस समय तपस्याके प्रभावसे उस कन्याके सम्पूर्ण पाप दग्ध हो चुके थे। फिर तो ब्रह्माजी कमलके समान नेत्रवाली वह दिव्य कुमारी जहाँ विराजमान थी, वहाँ पहुँचकर उस तपस्विनी दिव्य कुमारीको देखा और साथ ही वे ये वचन बोले—'कमनीय कान्तिवाली कल्याणि! तुम प्रधान कार्यकी अवहेलना करके अब तपस्या क्यों कर रही हो? विशाल नेत्रोंवाली कन्यके! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम वर माँग लो।'

'सृष्टि' देवीने कहा—'भगवन्! मैं एक स्थानपर नहीं रहना चाहती, इसलिये मैं आपसे यह वर माँगती हूँ कि मैं सर्वत्रगामिनी बन जाऊँ।' जब सृष्टिदेवीने प्रजापति ब्रह्मासे ऐसी बात कही, तब उन्होंने उससे कहा—'देवि! तुम सभी जगह जा सकोगी और सर्वव्यापिनी होगी। ब्रह्माजीके ऐसा कहते ही कमलके समान नेत्रोंवाली वह 'सृष्टि' देवी उन्हींके अङ्गमें लीन हो गयी। अब ब्रह्माजीकी सृष्टि बड़ी तेजीसे बढ़ने लगी और फिर शीघ्र ही उनके सात मानसपुत्र हुए। उन पुत्रोंसे भी अन्य संतानोंकी उत्पत्ति हुई। फिर उनसे बहुत-सी प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। इसके बाद स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज और अण्डज—इन चार प्रकारके प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई। फिर तो चर-अचर प्राणियोंकी सृष्टिसे यह सारा विश्व ही भर गया। यह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गमात्मक जगत् तथा सारा वाङ्मय विश्व—इन सबकी रचनामें उस 'सृष्टि'देवीका ही हाथ है। उसीने भूत, भविष्य और वर्तमान—इन तीनों कालोंकी भी व्यवस्था की।'

[अध्याय ९०]


त्रिशक्ति-माहात्म्यमें 'सृष्टि', 'सरस्वती' तथा 'वैष्णवी' देवियोंका वर्णन

भगवान् वराह कहते हैं—सुन्दर अङ्गोंसे शोभा पानेवाली वसुंधरे! उस 'सृष्टिदेवी'का दूसरा विधान भी बहुत विस्तृत है, उसे बताता हूँ, सुनो—परमेष्ठी रुद्रके द्वारा जो वह तीन शक्तिवाली देवी बतायी गयी है, उसके प्रकरणमें सर्वप्रथम श्वेत वर्णवाली सृष्टिदेवीका प्रसङ्ग आया है। वह सम्पूर्ण अक्षरोंसे युक्त होनेपर भी 'एकाक्षरा' कहलाती है। यह देवी कहीं तो 'वागीशा' और कहीं 'सरस्वती' कही जाती है और कहीं वह 'विश्वेश्वरी' और 'अमिताक्षरा' नामसे भी प्रसिद्ध है। कुछ स्थलोंमें उसीको 'ज्ञाननिधि' अथवा 'विभावरी' देवी भी कहते हैं। अथवा वरानने! जितने भी स्त्रीवाची नाम हैं, वे सभी उसके नाम हैं, ऐसा समझना चाहिये।

विष्णुके अंशवाली 'वैष्णवी' देवीका वर्ण लाल है। उनकी आँखें बड़ी-बड़ी हैं तथा उनका रूप अत्यन्त मनोहर है। ये दोनों शक्तियाँ तथा तीसरी जो रुद्रके अंशसे अभिव्यक्त रौद्रीशक्ति है, भगवान् रुद्रको जाननेवालेके लिये एक साथ सिद्ध हो जाती है। देवी वसुंधरे! यह सर्वरूपमयी देवी एक ही है, परंतु (वह एक ही यहाँ इस प्रकार) तीन भेदोंसे निर्दिष्ट है। सुन्दरि! मैंने तुम्हारे सामने