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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

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Page 152

अध्याय ८० ] मेरुपर्वतकी नदियाँ [ १४१

केवल एक ही विशाल शिला है, जिसपर एक भी वृक्ष अथवा लता नहीं है। विप्रवरो! इस शिलाका चतुर्थांश भाग जलमें डूबा रहता है। इस प्रकार उपत्यकाओं तथा पर्वतोंका वर्णन किया गया है, जो मेरुपर्वतके आस-पासमें यथास्थान शोभा पाते हैं। [अध्याय ७९]


मेरुपर्वतकी नदियाँ

भगवान् रुद्र कहते हैं—मेरुपर्वतके दक्षिण दिशामें बहुत-से पहाड़ एवं नदियाँ हैं। यह सिद्धोंकी आवासभूमि है। शिशिर और पतङ्ग नामक पर्वतके मध्यभागमें एक स्वच्छ भूमि है। वहाँ दिव्य एवं मुक्त स्त्रियाँ रहती हैं और वहाँके वृक्ष भी गलित पत्र हो गये हैं। वहीं इक्षुक्षेप नामक शिखर है, जिसकी वृक्ष शोभा बढ़ाते हैं। उस शिखरपर बहुत सुन्दर गूलरके वृक्षोंका एक वन है, जिसकी पक्षी समुदाय सदा सेवा करता है। उस वनके वृक्षपर जब फल लगते हैं तो वे ऐसे सुशोभित होते हैं, मानो महान् कछुवे हों। सिद्धादि आठ प्रकारकी देवयोनियाँ उस वनमें सदा निवास करती और उस वनकी रक्षा करती हैं। उस स्थानपर स्वच्छ एवं स्वादिष्ट जलवाली अनेक नदियाँ प्रवाहित होती हैं, जहाँ कर्दम-प्रजापतिका आश्रम है। वह सौ योजन परिमाणके एक वृत्ताकार वनसे घिरा है। वहीं ताम्राभ और पतङ्ग-पर्वतके मध्यभागमें एक महान् सरोवर है, जो दो सौ योजन लम्बा और सौ योजन चौड़ा है। उसके चारों ओर प्रातःकालीन सूर्यके तुल्य हजारों पत्तोंसे परिपूर्ण कमल उस सरोवरकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ अनेक सिद्ध और गन्धर्वोंका निवास है। उसके बीचमें एक महान् शिखर है, जिसकी लम्बाई तीन सौ योजन और चौड़ाई सौ योजन है। अनेक धातु और रत्न उसको सुशोभित करते रहते हैं। उसके ऊपर एक बहुत लम्बी-चौड़ी सड़क है, जिसके अगल-बगलमें रत्नोंसे बनी हुई चहारदीवारियाँ हैं। उस सड़कके पास ही पुलोम विद्याधरका पुर है, जिसके परिवारके व्यक्तियोंकी संख्या एक लाख है। इसी प्रकार विशाख और श्वेतनामक पर्वतोंके मध्यभागमें भी एक नदी है, जिसके पूर्वतितटपर एक बड़ा विशाल आम्रका वृक्ष है। उस वृक्षको सोनेके समान चमकनेवाले, उत्तम गन्धोंसे युक्त तथा महान् घड़ेकी आकृतिवाले असंख्य फल सब ओरसे मनोहर बना रहे हैं। वहाँ देवताओं और गन्धर्वोंका निवास है।

वहाँ सुमूल और वसुधार—ये दो प्रसिद्ध पर्वत हैं। इनके बीचमें तीन सौ योजन चौड़ी और पाँच सौ योजन लम्बी रिक्त भूमि है, जहाँ एक बिल्वका वृक्ष है। इससे भी बड़े घड़ेकी आकृतिवाले असंख्य फल गिरते रहते हैं। उन फलोंके रससे उस भूमिकी मिट्टी गीली हो जाती है और बिल्वफल खानेवाले गुह्यक लोग उस स्थलकी रक्षा करते हैं।

इसी प्रकार वसुधार और रत्नधार पर्वतोंके मध्यभागमें एक किंशुक अर्थात् पलाशका दिव्य वन है। वह वन सौ योजन चौड़ा और तीन सौ योजन लम्बा है। जब वह गन्धयुक्त वन फूलता है तब उसके पुष्पोंकी सुगन्धसे सौ योजनकी भूमि सुवासित हो जाती है। वहाँ जलकी कभी कमी नहीं होती और सिद्ध लोग वहाँ सदा निवास करते हैं। वहाँ भगवान् सूर्यका एक विशाल मन्दिर है। प्रजाओंकी रक्षा करनेवाले तथा जगत्के जनक भगवान् सूर्य वहाँ प्रति-मास अवतरित होते हैं, अतः देवतालोग वहाँ पहुँचकर उनकी स्तुति-नमस्कार आदिद्वारा आराधना करते हैं।