वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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न्यायकन्दली
सुवर्णमयसंस्थानरम्या सर्वोत्तरस्थितिः ।
सुमेरोः शृङ्गवीथीव टीकेयं न्यायकन्दली ॥ १ ॥
अक्षीणनिजपक्षेषु ख्यापयन्ती गुणानसौ ।
परप्रसिद्धसिद्धान्तान् दलति न्यायकन्दली ॥ २ ॥
आसीद् दक्षिणराढायां द्विजानां भूरिकर्मणाम् ।
भूरिसृष्टिरिति ग्रामो भूरिश्रेष्ठिजनाश्रयः ॥ ३ ॥
अम्भोरराशेरिवैतस्माद् बभूव क्षितिचन्द्रमाः ।
जगदानन्दनाद् वन्द्यो बृहस्पतिरिव द्विजः ॥ ४ ॥
तस्माद् विशुद्धगुणरत्नमहासमुद्रो विद्यालतासमवलम्बनभूरुहोऽभूत् ।
स्वच्छाययो विविधकीर्तिनदीप्रवाहप्रस्यन्दिनोत्तमबलो बलदेवनामा ॥ ५ ॥
तस्याभूद् भूरियशसो विशुद्धकुलसम्भवा ।
अब्बोकेत्यर्चितगुणा गुणिनी गृहमेधिनी ॥ ६ ॥
(१) यह 'न्यायकन्दली' टीका सुमेरु के शृङ्गों की पङ्क्तियों की तरह मनोरम
है; क्योंकि सुमेरु के शृङ्ग भी सुवर्ण (हिरण्य) के संस्थानों से रचित होने के कारण
रमणीय हैं और यह टीका भी सुवर्णों अर्थात् सुन्दर अक्षरों के विन्यास से रचित
होने के कारण अतिरमणीय है । सुमेरु का शृङ्ग भी सभी वस्तुओं की अपेक्षा
उत्तर दिशा में रहने के कारण 'सर्वोत्तरस्थित' है । यह टीका भी (प्रशस्तपाद-
भाष्य की) अन्य टीकाओं से उत्कृष्ट होने के कारण 'सर्वोत्तरस्थित' अर्थात्
सर्वातिशायिनी है ।
(२) इस टीका का नाम 'न्यायकन्दली' इसलिए है कि इसमें कथित न्याय
अपने सिद्धान्तों की पूर्ण रक्षा और विरोधी सिद्धान्तों का सम्यक् रूप से 'दलन'
करते हैं ।
(३) राढ़ देश के दक्षिण भाग में 'भूरिसृष्टि' नाम का एक गाँव था, जिसमें अनेक
सत्कर्मों के अनुष्ठान करनेवाले ब्राह्मणों का एवं अनेक सेठों का निवास था ।
(४) इसी गाँव में पृथ्वीतल के चन्द्रमा स्वरूप एवं बृहस्पति के समान
(बुद्धिमान्) एक द्विज उत्पन्न हुए, जो समुद्र से उत्पन्न आकाश के चन्द्रमा की तरह
विश्व के सभी प्राणियों को सुख देने के कारण सभी के वन्दनीय थे ।
(५) उन्हीं से अनेक प्रकार के यशों की नदी के सतत गतिशील प्रवाह से
प्राप्त उत्कृष्ट बल से युक्त (होने के कारण) अन्वर्थ नाम के निर्मल अन्तःकरणवाले
'बलदेव' उत्पन्न हुए, जो विद्यारूपी लता के आश्रयीभूत वृक्ष के समान एवं विशुद्ध
अनेक सद्गुणरूपी रत्नों के (आकर) महासमुद्र के समान थे ।
(६) अत्यन्त यशस्वी और गुणी उन्हीं (बलदेव) की अत्यन्त कुलीना,
गुणानुरागिणी एवं गृहकार्यदक्षा 'अब्बोका' नाम की पत्नी थीं ।