वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context७७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्मादिनिमित्तासम्भवात्, विभागान्तात्वाददर्शनात्, अधिकरणाधिकर्तव्ययोरेव
भावादिति ।
स च द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरं भाववल्लक्षणभेदात् ।
यथा भावस्य द्रव्यादीनां स्वाधारेषु आत्मानुरूपप्रत्यय-
कारण नहीं हो सकते । एवं विभाग से इस सम्बन्ध का नाश भी नहीं
देखा जाता एवं यह (समवाय) अधिकरण एवं आधेय रूप दो वस्तुओं
में ही देखा जाता है (अतः उन प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं
हो सकती)।
यह (समवाय) द्रव्यादि पाँचों पदार्थों से (सर्वथा भिन्न) स्वतन्त्र पदार्थ
ही है; क्योंकि जिस प्रकार सत्तारूप सामान्य या द्रव्यत्वादिरूप सामान्य
स्वसदृश (यह सद् है, यह द्रव्य है, यह गुण है इत्यादि) प्रतीतियों के
उत्पादक होने के कारण द्रव्यादि अपने आश्रयों से भिन्न हैं, उसी प्रकार
न्यायकन्दली
युतसिद्धत्वादिति । संयोगो हि युतसिद्धानामेव भवति । अयं त्वयुतसिद्धानामिति । तथा
संयोगोऽन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजो वा स्यादिति । इह तु अन्यतरकर्मादीनां निमित्ता-
नामभावो भावोत्पादककारणसामर्थ्याद्भवितव्यत् । संयोगस्य विभागान्तत्वं विभागविना-
श्यत्वं दृश्यते न समवायस्य । संयोगः स्वतन्त्रयोरपि भवति, यथोर्ध्वावस्थितयोरङ्गुल्योः ।
अयं त्वधिकरणाधिकर्तव्ययोरेव भवति, तस्मान्नायं संयोगः किन्तु तस्मात् पृथगेव ।
एवं स्थिते समवाये तस्य द्रव्यादिभ्यो भेदं प्रतिपादयति—स च
द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरमिति । कुत इत्यत आह—भाववल्लक्षणभेदादिति ।
के कर्म से होगा, अथवा संयोग से ही होगा । तन्तु एवं पट के इस सम्बन्ध के
लिए कथित अन्यतर कर्म प्रभृति कारणों में से किसी की भी अपेक्षा नहीं होती
है । यह तो अपने आश्रयीभूत पदार्थों के उत्पादक कारणों की सत्ता से स्थिति का
लाभ करता है । संयोग का अन्त अर्थात् विनाश विभाग से देखा जाता है; किन्तु
समवाय का विनाश ही नहीं होता (अतः संयोग से समवाय गतार्थ नहीं हो
सकता) एवं संयोग स्वतन्त्र (आधाराधेयभावानापन्न) वस्तुओं में भी होता है, जैसे
कि ऊपर उठी हुई दो अङ्गुलियों में संयोग होता है । समवाय सम्बन्ध आधार और
आधेयभूत दो वस्तुओं में ही होता है । तस्मात् समवाय संयोग नहीं है, उससे
अलग ही वस्तु है ।
इस प्रकार संयोग से समवाय की स्वतन्त्र सत्ता के सिद्ध हो जाने पर
"स द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरम्" इस वाक्य के द्वारा समवाय में द्रव्यादि पदार्थों
के भेद का उपपादन करते हैं । समवाय द्रव्यादि पदार्थों से भिन्न क्यों है ? इस