वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context७३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ततः शरीराद् बहिरपगतं ताभ्यामेव धर्माधर्माभ्यां समुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण
सम्बध्यते, तत्संक्रान्तं च स्वर्गं नरकं वा गत्वा आशयानुरूपेण शरीरेण
सम्बद्ध्यते, तत्संयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति ।
शरीर से निकला हुआ मन उन्हीं धर्मों और अधर्मों से उत्पन्न आतिवाहिक
शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । उस शरीर के साथ सम्बद्ध होकर ही
मन स्वर्ग या नरक को जाता है और वहाँ जाकर स्वर्ग या नरक के
भोगजनक धर्म और अधर्म के अनुरूप दूसरे शरीर के साथ सम्बद्ध
न्यायकन्दली
अपसर्पणकर्मोत्पत्तावात्ममनः संयोगोऽसमवायिकारणम्, मनः समवायिकारणम्, लब्ध-
वृत्ती धर्माधर्मौ निमित्तकारणम् । ततस्तदनन्तरं तन्मनो मृतशरीराद् बहिर्निर्गतं
ताभ्यामेव लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यां सकाशादुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बद्ध्यत ।
तत्संक्रान्तं तदातिवाहिकशरीरसंक्रान्तं मनः स्वर्गं नरकं वा गच्छति । तत्र गत्वा
आशयानुरूपेण कर्मानुरूपेण शरीरेण सम्बद्ध्यते । स्वर्गे नरके वा यदुपजातं शरीरं तत्र
तावन्मनःसम्बन्धेन भवितव्यम्, अन्यथा तस्मिन् देशे भोगासम्भवात् । न चात्मवद्गत्यैव
मनसो देहान्तरसम्बन्धोऽस्ति, अव्यापकत्वात् । गमनं च तस्येतावद् दूरं केवलस्य न
सम्भवति, महाप्रलयानन्तरावस्थाव्यतिरेकेणाशरीरस्य मनसः कर्माभावात् । तस्मान्मृत-
शरीरप्रत्यासन्नमदृष्टवशादुपजातक्रियैरणुभिर्ह्यणुकादिप्रक्रमेणारब्धमतिसूक्ष्ममनुपलब्धियोग्यं
आत्मा और मन का संयोग मन की इस अपसर्पण क्रिया का असमवायिकारण
है एवं मन समवायिकारण है तथा कार्यक्षम धर्म और अधर्म उसके निमित्तकारण
हैं । 'ततः' अर्थात् इसके बाद मृत शरीर से निकला हुआ वही मन अपने कार्य के
उत्पादन में पूर्णक्षम उन्हीं धर्म और अधर्म से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ
सम्बद्ध होता है । 'तत्संक्रान्तम्' अर्थात् आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध मन
स्वर्ग या नरक में चला जाता है । वहाँ जाकर आशय के अनुरूप अर्थात् अपने
कर्मों के अनुसार फल-भोग के अनुरूप शरीर के साथ सम्बद्ध हो जाता है ।
शरीर की उत्पत्ति स्वर्ग में हो या नरक में, उसमें मन का सम्बन्ध रहना आवश्यक
है, उसके बिना स्वर्गादि देशों में भी भोग नहीं हो सकता । जिस प्रकार विभु होने
के कारण आत्मा स्वर्गादि देशों में न जाकर भी उन देशों में उत्पन्न शरीरों के
साथ सम्बद्ध हो जाता है, उसी प्रकार से मन के बिना वहाँ गये, उन दूसरे शरीरों
के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; क्योंकि मन विभु नहीं है । इतनी दूर (शरीर
से असम्बद्ध) केवल मन का जाना भी सम्भव नहीं है; क्योंकि महाप्रलय को