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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

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Page 558

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९३
प्रशस्तपादभाष्यम्
यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानासमानजातीययोरसन्नेव सोऽन्य-
तरासिद्धोऽनध्यवसायहेतुत्त्वादनध्यवसितः, यथा सत्कार्यमुत्पत्तेरिति ।
४. कथित अन्यतरासिद्ध हेत्वाभास ही यदि अनुमेय (पक्ष) में रहे;
किन्तु सपक्ष और विपक्ष में न रहे, तो वही 'अनध्यवसाय' रूप ज्ञान
का हेतु होने से 'अनध्यवसित' नाम का हेत्वाभास कहा जाता है ।
जैसे कि ('कार्यं सद् उत्पत्तिमत्त्वात्' इस अनुमान का उत्पत्तिमत्त्व) हेतु
न्यायकन्दली
परिमाणत्वे सति सम्भवात्, व्यापकत्वे मनसो युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धायुगपदेव ज्ञानानि
प्रसज्यन्ते ।
अनुमेयोद्देशस्यागमविरोधः किं दूषणमत आह-अयं तु विरुद्धभेद इति ।
अयमागमविरुद्धोऽनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञेत्यविरोधिग्रहणेन निवर्त्तितानां प्रत्यक्षादि-
विरुद्ध नां प्रतिज्ञाभासानां प्रभेद एव, नायं सन्दिग्धो हेत्वाभासः; किन्तु विरुद्धप्रभेद
एवेति तु शब्दार्थः ।
अनध्यवसित इत्यसाधारणो हेत्वाभासः कथ्यते । तं व्युत्पादयति-
यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानासमानजातीययोरित्यादि । सर्वं कार्यमुत्पादात्
पूर्वमपि सदिति साध्यते, उत्पत्तेरिति हेतुः सांख्यानाम् । सति सपक्षे व्योमादा-
वसति विपक्षे गगनकुसुमादावभावात्रैकतरपक्षाध्यवसायं करोति । विशिष्टार्थ-
गया है कि अमूर्तत्व का साधक (अस्पर्शवत्त्व हेय) विरुद्ध हेत्वाभास का ही एक
प्रभेद है (सन्दिग्ध नहीं) ।
'असाधारण' नाम का हेत्वाभास ही (इस शास्त्र में) 'अनध्यवसित' शब्द से
कहा गया है । 'यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानजातीययोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा
उसी (असाधारण) को समझाते हैं । 'सभी कार्य अपनी उत्पत्ति से
पहले भी 'सत्' अर्थात् विद्यमान ही हैं' इसको सिद्ध करने के लिए सांख्याचार्यगण
'उत्पत्तेः' इस हेतुवाक्य का प्रयोग करते हैं । इस वाक्य के द्वारा उपस्थापित
यह 'उत्पत्ति' रूप हेतु 'असाधारण' (या अनध्यवसित) नाम का हेत्वाभास
है; क्योंकि (सदा से विद्यमान) आकाशरूप सपक्ष में भी यह हेतु नहीं है एवं
(सर्वदा असत्) आकाशकुसुमादि में भी यह 'उत्पत्ति' रूप हेतु नहीं है
(क्योंकि आकाश और आकाशकुसुम इन दोनों से किसी की उत्पत्ति नहीं
होती), अतः यह हेतु (कार्यों की उत्पत्ति से पूर्व सत्त्व और असत्त्व) इन
दोनों में से किसी भी पक्ष का साधन नहीं कर सकता । गगनादि नित्य पदार्थों
की तरह घटादि अनित्य पदार्थ भी अगर पहले से ही हैं, तो फिर 'उत्पत्ति' रूप
हेतु कहाँ रहेगा ? कहीं पर निश्चित न रहने के कारण सांख्याचार्यों के इस