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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

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Page 460

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४९५
न्यायकन्दली
यदि धवादिसाधारणी वृक्षता न शिंशपात्वम्, तदा नानयोरेकत्वं स्वभावभेदस्य
भेदसाधारणत्वात् । अभेदे तु यथा वृक्षत्वं सर्ववृक्षसाधारणं तथा शिंशपात्वमपि स्यात् । न
च तादात्म्ये गम्यगमकभावे व्यवस्था युक्ता, तस्याभेदाश्रयत्वात् । यदि शिंशपात्वे गृह्यमाणे
वृक्षत्वमगृहीतम्, क्व तादात्म्यम् ? गृहीतं चेत् ? (तत्) क्वानुमानम् ?
अथोच्यते-यथावस्थितो धर्मी, शिंशपात्वं वृक्षत्वं च त्रयमेकात्मकमेव, तत्र धर्मिणि
गृह्यमाणे शिंशपात्वं वृक्षत्वमपि गृहीतमेव । यथोक्तम्-
तस्माद् दृष्टस्य भावस्य दृष्ट एवाखिलो गुणः ।
भागः कोऽन्यो न दृष्टः स्याद्यः प्रमाणैः परीक्ष्यते ॥ इति ।
वह्नि जन्य मानना है, तो उसमें रहनेवाले वस्तुतः तदभिन्न पार्थिवत्वादि को भी वह्नि
जन्य मानना ही होगा) अतः कथित व्यभिचार है ही ।
यह भी निश्चय नहीं है कि शिंशपा तो वृक्ष रूप है, किन्तु (वृक्षत्व के आश्रय
धवखदिरादि अन्यवृक्षों में भी) साधारण रूप से रहने के कारण वृक्षत्व शिंशपा-
स्वरूप नहीं है; क्योंकि वृक्ष और शिंशपा दोनों अभिन्न हैं । यदि (प्र.) यह कहें कि
वृक्षत्व (शिंशपा की तरह उससे भिन्न) धवादि में भी है; किन्तु शिंशपात्व तो केवल
शिंशपा में ही है, धवादि में नहीं । (उ.) तो फिर वृक्षत्व और शिंशपात्व दोनों एक
नहीं हो सकते, क्योंकि स्वभावों की विभिन्नता ही वस्तुओं की विभिन्नता है¹ ।
यदि शिंशपात्व और वृक्षत्व को अभिन्न मानें तो फिर जिस प्रकार वृक्षत्व सभी
वृक्षों में रहता है,उसी प्रकार (वृक्षत्व से अभिन्न) शिंशपात्व की सत्ता भी सभी
वृक्षों में माननी ही पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि यदि वृक्षत्व और शिंशपात्व में
अभेद मानें तो यह निर्धारण नहीं हो सकता कि शिंशपात्व ही वृक्षत्व का ज्ञापक
है, वृक्षत्व शिंशपात्व का ज्ञापक नहीं । क्योंकि ज्ञाप्यज्ञापकभाव भेदों के अधीन है
(अर्थात् ज्ञाप्य और ज्ञापक को परस्पर भिन्न ही होना चाहिए) । शिंशपात्व का
ज्ञान हो जाने पर भी यदि वृक्षत्व अज्ञात ही रहता है, तो फिर शिंशपात्व और
वृक्षत्व में तादात्म्य कहाँ ? यदि शिंशपात्व के गृहीत होने पर उसी ज्ञान से वृक्षत्व
भी गृहीत हो जाता है, तो फिर वृक्षत्व के अनुमान की ही कौन-सी सम्भावना है ?
यदि यह कहें कि (प्र.) अपने स्वरूप में अवस्थित शिंशपावृक्ष रूप धर्मी एवं
वृक्षत्व और शिंशपात्व रूप दोनों धर्म, ये तीनों वस्तुतः एक ही हैं । अतः धर्मी के
गृहीत होने पर वृक्षत्व और शिंशपात्व रूप उसके धर्म भी उसी ज्ञान से गृहीत
हो जाते हैं । जैसा कहा गया है कि "तस्मात् किसी भी धर्मी के प्रत्यक्ष होने पर

  1. अर्थात् वृक्ष और शिंशपा इन दोनों में अगर अभेद है एवं इस कारण शिंशपा वृक्षात्मक
    है, तो फिर यह कैसे कह सकते हैं- वृक्ष शिंशपात्मक नहीं है ।