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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 408 of 759

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Page 408

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४३
प्रशस्तपादभाष्यम्
पदार्थेषूत्पद्यते । द्रव्ये तावद् द्विविधे महत्यनेकद्रव्यवत्त्योद्भूतरूप-
प्रकाशचतुष्टयसन्निकर्षाद् धर्मादिसामग्र्ये च स्वरूपालोचनमात्रम्,
यह (प्रत्यक्ष) द्रव्यादि पदार्थों का होता है। इसमें द्रव्य का प्रत्यक्ष दो प्रकार
का है १. निर्विकल्पक और २. सविकल्पक (द्रव्य के निर्विकल्पक और
सविकल्पक) दोनों ही प्रकार के प्रत्यक्ष होते हैं । १. अनेक द्रव्यवत्त्व
न्यायकन्दली
मिति । अक्षमक्षं प्रतीत्य प्राप्य यदुत्पद्यते, तत् प्रत्यक्षं प्रमाणमिति । कारणविशेषजन्यत्वमपि
कार्यस्य समानासमानजातीयव्यवच्छेदसमर्थत्वाल्लक्षणं भवति । यथा यवबीजप्रभवत्वं यवा-
ङ्कुरस्य, अत एव यवाङ्कुर इति व्यपदिश्यते । सुखदुःखसंस्काराणामपीन्द्रियजन्यत्वात् प्रत्यक्ष-
प्रमाणत्वप्रसङ्ग इति चेन्न, बुद्धयधिकरणेन विशेषितत्वात् । अक्षमक्षं प्रतीत्य या बुद्धि-
रुत्पद्यते, तत् प्रत्यक्षम् । सुखादयश्च न बुद्धिस्वभावाः कुतस्तेषु प्रसक्तिः ? यद्येवं सन्नि-
कर्षस्य प्रामाण्यं न लभ्यते ? सत्यम् । इतो वाक्यान्न लभ्यते, यदि तु करणव्युत्पत्त्या तस्यापि
कारणों से उत्पन्न होना भी लक्ष्य को समानजातियों और असमानजातियों से भिन्न
रूप से समझाने में समर्थ होने के कारण लक्षण हो सकता है । (जैसे कि) यव के
अङ्कुर से उत्पन्न होना ही यव का लक्षण है, अत एव वह 'यवाङ्कूर' कहलाता है ।
(प्र.) सुख, दुःख और संस्कार ये सभी भी तो इन्द्रियों से उत्पन्न होते हैं, अतः इन
सबों में प्रत्यक्षलक्षण की आपत्ति होगी । (उ.) यह आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि
प्रत्यक्ष का लक्षण बुद्धि निरूपण को आरम्भ करने के बाद कहा गया है। (तदनुसार)
प्रत्यक्ष का यह लक्षण निष्पन्न होता है कि इन्द्रिय के सम्बन्ध से उत्पन्न जो ज्ञान,
वही प्रत्यक्ष प्रमाण है । (प्र.) यदि यह बात है तो फिर यह उपपन्न नहीं होगा कि
'इन्द्रिय का सम्बन्ध प्रमाण है' । (उ.) यह ठीक है कि उक्त लक्षण वाक्य के द्वारा
इन्द्रियसम्बन्ध में प्रामाण्य का लाभ नहीं होगा, किन्तु 'परिच्छेद' अर्थात् प्रमिति के
कारण होने से इन्द्रियसम्बन्ध का प्रमाण होना भी अभीष्ट है । प्रकरण से यह
समझा जाता है कि 'यह विद्या का निरूपण है' । अतः विद्या से बहिर्भूत संशय
और विपर्यय में प्रामाण्य स्वतः खण्डित हो जाता है । 'अक्षमप्रतीत्य यदुत्पद्यते
ज्ञानम्' केवल ऐसी ही व्युत्पत्ति मानें (अर्थात् अक्षम् अक्षम् यह वीप्सा न मानें) तो
फिर अतिप्रसिद्ध होने के कारण कभी किसी को यह भ्रान्ति भी हो सकती है कि
'बाह्येन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है' इस भ्रान्ति की सम्भावना को हटाने के लिए ही
'अक्षम् अक्षम्' वीप्सा से युक्त इस व्युत्पत्ति का आश्रय लिया गया है । 'प्रत्यक्ष' शब्द
'कुगतिप्रादयः' इस सूत्र के द्वारा विहित 'प्रादिसमास' के द्वारा सिद्ध है ।
'प्रतिगतमक्षम्' इस समास के कारण विशेष्यवाचक पद के अनुसार 'प्रत्यक्ष' पद में