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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 391 of 759

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Page 391

४२६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय-
प्रशस्तपादभाष्यम्
वाश्व इति । असत्यपि प्रत्यक्षे प्रत्यक्षाभिमानो भवति, यथा व्यपगत-
अभाव, आत्मा और मन के संयोग एवं अधर्म इन तीन हेतुओं से होती
है । (इन कारणों में से) आत्ममनःसंयोग को उक्त दोनों विषयों के ज्ञान
से उत्पन्न संस्कार का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । यह (विपर्यय)
कफ, पित्त और वायु के प्रकोप से बिगड़ी हुई इन्द्रियवाले पुरुष को ही होता
है । जैसे गो में अश्व का ज्ञान (विपर्यय है)। (विपर्यय के और उदाहरण
न्यायकन्दली
व्याप्रियमाणे चक्षुषि तत्संयुक्तमेव तु गोपिण्डमश्वात्मना गृह्णती यदीयं नेन्द्रिया, का
तहींन्द्रियजा भविष्यति विपरीतख्यातिः ? अत एवान्यस्यान्यारोपेण प्रतिभासनाद् योऽपि
निरधिष्ठाने विपर्ययस्तत्राप्यवर्त्तमानोऽर्थः स्वरूपविपरीतेन वर्त्तमानाकारेण प्रतीयत
इति विपरीतख्यातिरेव, न त्वसत्ख्यातिः, स्वरूपतोऽर्थस्य सम्भवादसतो वावभास-
नायोगात् । यत्र सदृशधर्ममधिष्ठाय विपर्ययः प्रवर्त्तते, तत्र सादृश्यं कारणम्, निरधिष्ठाने
तु विभ्रमे मनोदोषमात्रानुबन्धिनि नास्य सम्भवः, यथा हि कामातुरस्य इतस्ततो
भाविनि स्त्रीनिर्भासे विज्ञाने । संस्कारोऽपि तत्रैव कारणं यत्र सविकल्पको
सादृश्य के अनुरोध से अश्व का अनुभव रूप ही ज्ञान होता है । अतः सभी जगह
सभी का प्रतिभास (विपर्यय भी) नहीं होता, क्योंकि कथित सादृश्य और संस्कार
ये दोनों ही उसको नियमित करते हैं । अत एव 'गुरु' इसे 'इन्द्रियजनित भ्रान्ति'
कहते हैं । यह भ्रान्ति अगर इन्द्रिय से उत्पन्न न हो, केवल संस्कार के सामर्थ्य से
ही उत्पन्न हो तो फिर गोरूप आश्रय से दूर रहनेवाले एवं आश्रय में न रहनेवाले
अश्वत्व को ही प्रकाशित करेगी । अथवा जिस पुरुष की इन्द्रियों का व्यापार
निरुद्ध है, उसे भी उक्त आकार की भ्रान्ति होगी । व्यापार से युक्त चक्षु के साथ
संयुक्त गोपिण्ड को अश्वरूप से ग्रहण करती हुई भी अगर यह अनुभूति भ्रान्ति
नहीं है, तो फिर कौन सी विपरीतख्याति इन्द्रियजनित होगी ? अत एव विपर्यय
विपरीतख्याति ही है, असत्ख्याति नहीं, क्योंकि विपर्यय में एक का ही दूसरे रूप
से भान होता है । एवं जहाँ बिना अधिष्ठान के भी विपर्यय होता है, वहाँ भी
अवर्त्तमान अर्थ ही अपने विरुद्ध वर्तमान की तरह प्रतिभासित होता है । चूँकि
स्वरूपतः वस्तु की सम्भावना है, एवं सर्वथा अविद्यमान वस्तु का भान असम्भव है ।
जहाँ सदृश वस्तु को अधिष्ठान बनाकर विपर्यय की प्रवृत्ति होती है, वहाँ
सादृश्यज्ञान ही विपर्यय का कारण है । जहाँ केवल मन के दोष से बिना
अधिष्ठान का ही विपर्यय होता है, जैसे कि कामातुर पुरुष को चारों तरफ की सभी
वस्तुएँ स्त्रीमय दिखती है, वहाँ सादृश्य का ज्ञान कारण नहीं हो सकता । संस्कार