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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 353 of 759

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Page 353

३८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्मिन् विनष्टे तदाश्रितस्य द्व्यणुकाणुविभागस्य विनाशः। ततश्च विरोधि-
गुणासम्भवान्नित्यद्रव्यसमवेतकर्मणो नित्यत्वमिति।
द्व्यणुक का भी नाश हो जाता है। जलीय द्व्यणुक के विनष्ट हो जाने
पर उसमें रहनेवाले जलीय द्व्यणुक और उदासीन परमाणु के विभाग
का भी नाश होता है। अतः (उत्तरसंयोग रूप) विरोधी गुण की
उत्पत्ति की सम्भावना नहीं रहती; क्योंकि उत्तरदेश संयोग के लिए
पूर्वदेश के संयोग का विनाश भी आवश्यक है। एवं पूर्वदेश के संयोग
का विनाश तभी होगा, जब कि उससे अव्यवहित पूर्व काल में जलीय
द्व्यणुक और उदासीन परमाणु के विभाग की सत्ता रहे, (क्योंकि वही
वह विरोधी गुण है, जिससे यहाँ उस पूर्वदेश के संयोग का नाश होगा।
विरोधी गुण की इस असम्भावना से) परमाणुरूप नित्य द्रव्य में
रहनेवाली क्रिया में नित्यत्व की आपत्ति होगी।
न्यायकन्दली
विनाशहेतोरसम्भवान्नित्यपरमाणुसमवेतस्य कर्मणो नित्यत्वं स्यात्।
पूर्वोक्तं तावत्परिहरति—तन्त्वंश्र्वन्तरविभागाद्विभाग इत्यदोषः।
कार्याविष्टे कारणे कर्मोत्पन्नमवयवान्तरेण समं स्वाश्रयस्य विभागं
कुर्वदाकाशादिदेशाद्विभागं न करोतीति नियमः, आकाशादिदेशविभाग-
कर्तृत्वस्य विशिष्टविभागानाम्भकत्वेन व्याप्तत्वात्। अवयवान्तरस्यावयवेन
स्वाश्रयसंयोगिना समं तु करोत्येव, विरोधाभावात्। अतो द्वितन्तुककारणे
(क्रिया का) विरोधी गुण के विनाश का कोई कारण ही नहीं रह पाएगा। अतः
परमाणु में रहनेवाली क्रिया (परमाणु की नित्यता के कारण) नित्य हो जाएगी।
'तन्त्वंश्र्वन्तरविभागाद्विभागः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पूर्वकथित दोष का
परिहार करते हैं।
यह नियम है कि कार्य के साथ सम्बद्ध कारण में उत्पन्न हुई क्रिया अपने आश्रय
के दूसरे अववयव के साथ विभाग को उत्पन्न करने के समय अपने आश्रय के आकाशादि
देशों के साथ विभागों को उत्पन्न नहीं करती; क्योंकि यह व्याप्ति है कि जो अपने
आश्रय का आकाशादि देशों के साथ विभाग का उत्पादक होगा, वह कभी भी विशिष्ट
विभाग (अर्थात् क्रिया के आश्रयीभूत एक अवयव का दूसरे अवयव के साथ विभाग)
का उत्पादक नहीं हो सकता। (किन्तु उक्त क्रिया) अपने आश्रय के संयोग से युक्त
अवयव के साथ तो विभाग को अवश्य ही उत्पन्न करती है; क्योंकि इसमें कोई विरोध
नहीं है। दो तन्तुओं से बने हुए पट के कारणीभूत एक तन्तु में उत्पन्न हुई क्रिया,