वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context२६ प्रशस्तपादभाष्यम्
असमवायिकारण नहीं हो सकती, अतः उसके असमवायिकारण होने की बात ही
नहीं उठती । सुतरां प्रकृत में हाथ और शरीर इन दोनों के लिए गुण रूप किसी
असमवायिकारण की कल्पना आवश्यक है । यह गुण उक्त संयोग से अव्यवहित
पूर्वक्षण में नियत रूप से रहनेवो हाथ और पुस्तक के संयोग को छोड़कर दूसरा
नहीं हो सकता । अतः हाथ और पुस्तक की क्रिया से उत्पन्न संयोग से ही शरीर
और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । सुतरां संयोगजसंयोग का मानना
आवश्यक है ।
(१) नोदन और (२) अभिघात संयोग के ये दो और प्रकार भी हैं । जिस
संयोग से शब्द की उत्पत्ति न हो उसे 'नोदन' कहते हैं । एवं इसके विपरीत जिस
संयोग से शब्द की उत्पत्ति हो उसे 'अभिघात' कहते हैं ।
विभाग
संयोग को विनष्ट करनेवाले गुण का नाम 'विभाग' है । संयोग की तरह यह
भी (१) एक क्रिया से उत्पन्न, (२) दो क्रियाओं से उत्पन्न और (३) विभाग से
उत्पन्न भेद से तीन प्रकार का है । पर्वत से पक्षी का विभाग केवल पक्षी में
रहनेवाली क्रिया से ही उत्पन्न होता है । परस्पर गुथे हुए दो पहलवानों का विभाग
दोनों पहलवानों में से प्रत्येक में रहनेवाली अलग-अलग दो क्रियाओं से उत्पन्न
होता है ।
संयोगजसंयोग की तरह 'विभागजविभाग' का भी मानना आवश्यक है;
क्योंकि किसी व्यक्ति के हाथ का संयोग अगर किसी वृक्ष के साथ था और हाथ
की क्रिया से उस संयोग के छूट जाने पर वृक्ष से हाथ का विभाग हो जाता है ।
हाथ और वृक्ष के इस विभाग के उत्पन्न होने पर वृक्ष से शरीर के विभाग की भी
प्रतीति होती है । शरीर और वृक्ष का विभाग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो
फिर शरीर को क्रिया से या वृक्ष की क्रिया से अथवा दोनों की क्रिया से ही उत्पन्न
हो सकता है । प्रकृत में क्रिया केवल हाथ में ही है, पूरे शरीर में नहीं । वृक्ष में
तो है ही नहीं । हाथ अवयव है शरीर अवयवी, अतः दोनों भिन्न हैं । सुतरां घट
की क्रिया से जैसे कि पट और दण्ड का विभाग उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी
प्रकार हाथ की क्रिया से शरीर और वृक्ष का भी विभाग नहीं उत्पन्न हो सकता ।
अतः हाथ और वृक्ष का विभाग हो शरीर और वृक्ष के विभाग का कारण है ।
अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है । इसी हेतु से विभाग को
संयोगध्वंस रूप न मानकर स्वतन्त्र गुणरूप भाव पदार्थ मानना पड़ता है । अगर
ऐसा न मानें अर्थात् विभाग को संयोगध्वंस रूप ही मानें तो हाथ और तरु के
विभाग के बाद जो शरीर और तरु के विभाग की प्रतीति होती है, वह नहीं
हो सकेगी; क्योंकि शरीर और तरु का विभाग शरीर और तरु के संयोग का ही