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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 307 of 759

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Page 307

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
अथ कथंलक्षणः ? कतिविधश्चेति । अप्राप्तयोः प्राप्तिः
संयोगः । स च त्रिविधः - अन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, संयोगजश्च ।
(प्र.) उसका स्वरूप (लक्षण) क्या है ? एवं वह कितने
प्रकार का है ? (उ.) अप्राप्त (परस्पर न मिले हुए दो द्रव्यों
की प्राप्ति) मिलन (ही) संयोग है । वह १. अन्यतरकर्मज, २. उभय-
कर्मज और ३. संयोगज भेद से तीन प्रकार का है । इसमें (१)
न्यायकन्दली
सहिता सामग्री कारणम्, कदाचिदु द्वितीयमन्त्रादिसहिता कारणमित्यस्यां कल्पनायां को
विरोधः ? यदनुरोधाददृष्टमाश्रीयते । दृष्टो ह्येकपरस्यापि कार्यस्य सामग्रीभेदः, यथा
दारुनिर्मथनप्रभवो वह्निः सूर्यकान्तप्रभवश्चेति तर्कसिद्धान्तरहस्यम् । मीमांसासिद्धान्तरहस्यं
तत्त्वप्रबोधे कथितमस्माभिः ।
संयोगः संयुक्तप्रत्ययनिमित्तमित्यवगतं तावत्; किन्त्वस्य स्वरूपं भेदश्च न
ज्ञायते तदर्थं परिपृच्छति-अथ कथंलक्षणः कतिविधश्चेति । अथेति प्रश्नोपक्षेपे
कथंशब्दः किंशब्दार्थे, यथा को धर्मः कथंलक्षण इति । लक्षणशब्दश्च
स्वरूपवचन इति किंस्वरूपः संयोगः ? कतिविधश्चेति कतिप्रकार इत्यर्थः ।
लक्षणं कथयति-अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः । पूर्वमप्राप्तयोर्द्रव्ययोः पश्चाद्या
प्रतिबन्धकीभूत मन्त्रादि सहित कारणों का समूह ही कार्य को उत्पन्न करता है एवं
कभी द्वितीय (प्रतिबन्धक मन्त्रादि के विरोधी) मन्त्रादि सहित कारणों का समूह ही
उसका कारण होता है, इन दोनों कल्पनाओं में कौन-सा विरोध है कि जिसके
लिए आप (मीमांसक) अदृष्ट (शक्ति) का अवलम्बन करते हैं । एक तरह के
कार्यों की उत्पत्ति अनेक प्रकार के कारणों से देखी जाती है । जैसे कि काठ की
रगड़ से भी अग्नि की उत्पत्ति होती है एवं सूर्यकान्तमणि से भी । (शक्ति के
विषय में) यही तार्किकों के सिद्धान्त का रहस्य है । (शक्ति पदार्थ की सत्ता के
प्रसङ्ग में) मीमांसकों के अभिमत सिद्धान्त के रहस्य का निरूपण मैंने 'तत्त्वप्रबोध'
नाम के ग्रन्थ में किया है ।
यह तो समझा कि 'ये परस्पर संयुक्त हैं' इस आकार की प्रतीति का कारण ही
संयोग है ; किन्तु यह तो नहीं समझ सके कि इसका स्वरूप क्या है ? इसके कितने
भेद हैं ? यही समझाने के लिए 'अथ कथं लक्षणः ? कतिविधश्च ?' इत्यादि प्रश्न
करते हैं । यहाँ 'अथ' शब्द का अर्थ है 'प्रश्न का आरम्भ करना' एवं 'कथम्' शब्द
'किम्' शब्द के स्थान में आया है । जैसे कि (शाबरभाष्य अ.१.पा.१. सू.१ के) 'को
धर्मः ? कथं लक्षणः ?' इत्यादि स्थलों में (ये शब्द) प्रयुक्त हुए हैं । प्रकृत में