वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context२४ प्रशस्तपादभाष्यम्
परिमाण से घट में परिमाण की उत्पत्ति होती है; किन्तु उसी परिमाण के तीन
कपालों से जिस घट की उत्पत्ति होगी, उस घट का परिमाण दो कपालों से उत्पन्न
घट के परिमाण से भिन्न होगा। इस विलक्षण परिमाण का कारण तीनों कपालों
का परिमाण नहीं हो सकता; क्योंकि इन तीनों कपालों का परिमाण भी पहले घट
के उत्पादक दोनों कपालों के समान ही है। अतः उक्त तीन कपालों से उत्पन्न घट
में जो उक्त दोनों कपालों से उत्पन्न घट के परिमाण से विलक्षण परिमाण उपलब्ध
होता है, उसका कारण कपालों की त्रित्व संख्या ही है। अतः संख्या भी परिमाण
का कारण है। इस प्रकार संख्या में स्वीकृत परिमाण की कारणता के अनुसार
ही अणु परिमाणों में किसी भी वस्तु की कारणता का अस्वीकार करना वैशेषिकों
के लिए संभव होता है। वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार अणुपरिमाण किसी के
भी कारण नहीं हैं। परमाणुओं के परिमाण और द्व्यणुकों के परिमाण ही
अणुपरिमाण हैं। ये अगर कारण होंगे तो परमाणु के परिमाण द्व्यणुकों के
परिमाण के कारण होंगे और द्व्यणुकों के परिमाण त्र्यसरेणु के परिमाण के
कारण होंगे; किन्तु सो संभव नहीं है; क्योंकि परिमाणों में यह नियम देखा जाता
है कि वे अपने समान जाति के अपने से उत्कृष्ट परिमाण को ही उत्पन्न करते हैं।
कपालों में महत् परिमाण हैं, उसके परिमाणों से घट का जो परिमाण उत्पन्न होता
है, वह कपाल परिमाण से महत्तर होता है। अर्थात् कपाल परिमाण में रहनेवाली
महत्त्व जाति भी उसमें है और कपाल परिमाण से वह बड़ा भी है। इस नियम के
अनुसार परमाणुओं के परिमाणों से द्व्यणुकों के परिमाणों की उत्पत्ति मानने से
द्व्यणुक के परिमाणों में अणुत्व-जाति के साथ-साथ परमाणुओं के परिमाण से
न्यूनता भी माननी पड़ेगी; क्योंकि जिस प्रकार महत्परिमाण से उत्पन्न होनेवाले
परिमाण महत्तर होते हैं, उसी प्रकार अणुपरिमाण से उत्पन्न होनेवाले परिमाण
अणुतर होंगे। इसी प्रकार द्व्यणुकों में रहनेवाले अणुपरिमाणों से अगर त्र्यसरेणु
परिमाण की उत्पत्ति मानें तो वह द्व्यणुक के परिमाण से छोटा होगा। फलतः
त्र्यसरेणु का प्रत्यक्ष न हो सकेगा। जिससे आगे की प्रत्यक्ष धारा ही रुक जाएगी।
जो जगत् के अप्रत्यक्ष में परिणत हो जाएगी। तस्मात् द्व्यणुक परिमाण के
उत्पादक दोनों परमाणुओं की द्वित्व संख्या ही है एवं तीन द्व्यणुकों से उत्पन्न
होनेवाले त्र्यसरेणु के परिमाण का उसके उपादानभूत तीनों द्व्यणुकों की त्रित्व
संख्या ही कारण है। घटादि के विशेष प्रकार के परिमाणों के लिए भी संख्या की
अपेक्षा का उपपादन कर चुके हैं। अतः जन्य अणुपरिमाणों के लिए वह कोई
नवीन कल्पना भी नहीं है।
'प्रचय' भी परिमाण का कारण है। इसी से सेर भर लोहे की लम्बाई-चौड़ाई
और सेर भर रूई की लम्बाई-चौड़ाई में अन्तर उपलब्ध होता है। यह अन्तर
अवयवों के परिमाण या अवयवों की संख्या से उपपन्न नहीं हो सकते। कथित