Skip to content
SarvaKosh
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 223 of 759

Read in context
Page 223

२६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
नन्वयं प्रत्ययो रूपादिविषयः ? न, तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात् । रूपनिमित्तो हि प्रत्ययो
नीलं पीतमित्येवं स्यान्न त्वेकं द्वे इत्यादि । अस्तु तर्हि निर्विषयो रूपादिद्व्यतिरि-
क्तस्यार्थस्याभावात् । कुतोऽस्मिन्नेकद्वित्रीणीत्याद्याकारो जातः ? आलयविज्ञानप्रति-
बद्धवासनापरिपाकादिति चेत् ? नीलाद्याकारोऽपि तत एवास्तु, न हि ज्ञानारूढस्य तस्य
सङ्ख्याकारस्य वा कश्चिदनुभवकृतो विशेषो येनैकोऽर्थजोऽनर्थजश्चापर इति प्रतिपद्यामहे ।
अथायं विशेषोऽयमभ्रान्तो नीलाकारः, सङ्ख्याकारस्तु विप्लुत इति । तदसारम्,
नीलाकारस्याप्यत्राभ्रान्तत्वे प्रमाणाभावात् । न तावत् क्वचिदस्यास्ति संवादः,
तदेकज्ञाननियतत्वात् क्षणिकत्वाच्च । अत एव नार्थक्रियापि । न च प्रत्येकं
सर्वज्ञानेषु स्वाकारमात्रसमाहितेषु पूर्वपरज्ञानवर्तिनामाकाराणां सादृश्यप्रतिपत्ति-
को संख्या का साधक हेतु समझना चाहिए¹ ।
(प्र.) ये ('एकः, द्वौ' इत्यादि) प्रतीतियाँ तो रूपादिविषयक हैं ? (उ.)
रूपादिविषयक प्रतीतियाँ 'यह नील है, यह पीत है' इत्यादि आकारों की होती हैं,
'एकः द्वौ' इत्यादि प्रतीतियाँ उनसे भिन्न आकार की हैं । अतः ये रूपादिविषयक
नहीं हैं । (प्र.) (प्रत्यक्ष से दीखने वाले) रूपादि पदार्थों से भिन्न किसी वस्तु की
सत्ता नहीं है । अतः 'एकः द्वौ' इत्यादि प्रतीतियाँ (अगर रूपादिविषयक नहीं हैं
तो फिर) बिना विषय के (निर्विषयक) ही मानी जायें ? (उ.) तो फिर इस प्रतीति
में 'एकः, द्वौ' इत्यादि आकार किससे उत्पन्न होते हैं । (प्र.) आलयविज्ञान में
नियत रूप से सम्बद्ध वासना के परिपाक से ही (उक्त आकार उत्पन्न होते हैं)
(उ.) इस प्रकार तो नीलाकार, पीताकारादि ज्ञान भी उस वासना से ही उत्पन्न
होंगे (फलतः निर्विषयक होंगे); क्योंकि ज्ञानों में सम्बद्ध संख्या के आकारों
में एवं नीलादि के आकारों में कोई अन्तर नहीं है । अतः नीलादिविषयक
प्रतीतियों को अर्थ (नीलादि) जन्य मानें एवं संख्याविषयक प्रतीति को अनर्थ
(केवल वासना) जन्य मानें, इसमें कोई विशेष युक्ति नहीं है । (प्र.) यही दोनों में
अन्तर है कि नीलादि आकार अभ्रान्त हैं और संख्यादि आकार भ्रान्त हैं ।
(उ.) यह समाधान ठीक नहीं है; क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि
नीलादि आकार अभ्रान्त हैं । एवं प्रत्येक आकार क्षणिक है, अतः एक
आकार नियमतः एक ही ज्ञान से गृहीत हो सकता है । सुतरां नीलादि
आकारों की अभ्रान्तता किसी प्रमाण से निश्चित नहीं हो सकती । प्रत्येक ज्ञान
क्षणिक होने के कारण अर्थक्रियाकारी (कार्यजनक) होने पर भी नीलाकारादि की

  1. अर्थात् जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' विशेष प्रकार के इस शब्द के प्रयोग में दण्ड कारण है
    उसी प्रकार 'एकः, द्वौ, त्रीणि' इत्यादि प्रयोगों का भी कोई कारण अवश्य है । वही है
    संख्या ।