वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context२६० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादीनां पाकजोत्पत्ति-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तदनन्तरं भोगिनामदृष्टापेक्षादात्माणुसंयोगादुत्पन्नपाकजेष्वणुषु कर्मोत्पत्तौ
तेषां परस्परसंयोगाद् द्व्यणुकादिक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते । तत्र च कारण-
गुणप्रक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः ।
इसके बाद भोग करनेवाले आत्मा के अदृष्ट एवं आत्मा और
परमाणुओं के संयोग इन दोनों से पाकजनित विलक्षण रूपादि से युक्त
परमाणुओं में परस्पर संयोग उत्पन्न होते हैं । इन संयोगों से द्व्यणुकादि
की उत्पत्ति के क्रम से (घटादि) स्थूल द्रव्य की उत्पत्ति होती है । फिर
इस (नये) कार्य-द्रव्य में स्वाभाविक कारणगुण के क्रम से रूपादि गुणों
की उत्पत्ति होती है ।
न्यायकन्दली
वसीयते । परमाणुरूपादिविनाशोत्पादावेककारणकौ न भवतः, रूपादिविनाशोत्पादत्वात्
तन्तुरूपादिविनाशोत्पादवत् ।
तदनन्तरमित्यादि । उत्पन्नेषु घटादिषु येषां तत्साध्ययोः सुखदुःखयोरनुभवो भोगो
भविष्यति ते भोगिनः, तेषामदृष्टं धर्माधर्मलक्षणम्, तमपेक्षमाणादात्मपरमाणुसंयोगा-
दुत्पन्नपाकजरूपरसगन्धस्पर्शेषु परमाणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते । तेभ्यस्तेषां परमाणूनां परस्पर-
संयोगास्ततश्च द्वाभ्यां द्व्यणुकं त्रिभिर्द्व्यणुकैस्त्र्यणुकमित्यनेन क्रमेण कार्यद्रव्यं
घटादिकमुत्पद्यत इति । तत्र च कारणगुणप्रक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः । परमाणुद्वयरूपाभ्यां
द्व्यणुके रूपं द्व्यणुकरूपेभ्यश्च त्र्यणुकरूपमित्यनेन क्रमेण घटादौ रूपरसगन्धस्पर्शोत्पत्तिः ।
वे भी उत्पत्ति और विनाश हैं, उसी प्रकार उसी हेतु से यह भी निष्पन्न होता है कि पर-
माणुओं के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश दोनों ही एक सामग्री से उत्पन्न नहीं होते ।
'तदनन्तरम्' अर्थात् घटादि द्रव्यों के उत्पन्न हो जाने के बाद उन घटादि द्रव्यों से
जिन जीवों को सुख या दुःख का अनुभव रूप 'भोग' होगा, वे ही जीव
(भोगिनाम्' इस पद के) 'भोगी' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन्हीं के अदृष्ट अर्थात्
धर्म और अधर्म एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन सबों से पाकज रूपादि
से युक्त परमाणुओं में क्रियायें उत्पन्न होती हैं । इन क्रियाओं से उन परमाणुओं में
परस्पर संयोग उत्पन्न होते हैं । उक्त संयोग एवं दो परमाणुओं से द्व्यणुक एवं
तीन द्व्यणुकों से 'त्र्यणुक' इसी क्रम से (अभिनव) घटादि द्रव्यों की उत्पत्ति होती
है । 'उसमें' अर्थात् द्व्यणुक में 'कारणगुणक्रम' से अर्थात् परमाणुओं
के (पाकज) रूपों से (द्व्यणुकों में) रूपों की उत्पत्ति होती है । अर्थात्
दोनों परमाणुओं के दोनों रूपों से द्व्यणुक में एक रूप की उत्पत्ति
होती है । एवं तीन द्व्यणुकों के तीनों रूपों से त्र्यणुक में एक