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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 209 of 759

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Page 209

२५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्पर्श-
प्रशस्तपादभाष्यम्
रसो रसनग्राह्यः पृथिव्युदकवृत्तिर्जीवनपुष्टिबलारोग्यनिमित्तं रसनसहकारी
मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायभेदभिन्नः । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत्।
रसनेन्द्रिय से गृहीत होनेवाला (गुण ही) 'रस' है । वह पृथिवी
और जल इन दो द्रव्यों में ही रहता है एवं जीवन, पुष्टि, बल और
आरोग्य का कारण है । प्रत्यक्ष के उत्पादन में रसनेन्द्रिय का सहायक
है । वह मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त भेद से छः
प्रकार का है । नित्यत्व एवं अनित्यत्व के प्रसङ्ग में इसकी सभी बातें
रूप की तरह हैं ।
न्यायकन्दली
र्यन्निवृत्तौ चानिवृत्तिर्न तयोस्तादात्म्यमिति प्रक्रियेयम् । न चात्यन्तभेदे पृथगुपलम्भ-
प्रसङ्गः, सर्वदा रूपस्य द्रव्याश्रितत्वात् । एतदेव कथम् ? वस्तुस्वाभाव्यादिति
कृतं गुरुप्रतिकूलवादेन ।
सम्प्रति बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यस्य प्रत्यक्षद्रव्यवृत्तेर्विशेषगुणस्य निरूपण-
प्रसङ्गेन रसगन्धयोर्व्याख्यातव्ययोरुभयद्रव्यवृत्तित्वाविशेषेणादौ रूपं व्याख्याय
रसं व्याचष्टे-रसो रसनग्राह्य इति । गुणेषु मध्ये रस एव रसनग्राह्यो रसनग्राह्य
एते रसः । पृथिव्युदकवृत्तिः । पृथिव्युदकयोरेव वर्तते । जीवनपुष्टिबला-
ही जिसकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं हो जाती एवं जिसके विनाश से ही जिसका विनाश
सिद्ध नहीं हो जाता, वे दोनों अभिन्न नहीं हो सकते । (प्र.) अगर रूप और द्रव्य
अत्यन्त भिन्न हैं, तो द्रव्य को छोड़कर भी रूप की प्रतीति होनी चाहिए । (उ.)
नहीं; क्योंकि रूप सभी कालों में द्रव्य में ही रहता है । (प्र.) यहीं क्यों होता है ?
(उ.) यह तो वस्तुओं का स्वभाव है । गुरुचरणों के विरुद्ध व्यर्थ की बातों को
बढ़ाना व्यर्थ है ।
अब एक ही बाह्य इन्द्रिय से गृहीत होनेवाले एवं प्रत्यक्ष योग्य द्रव्यों में ही
रहने वाले गुणों का निरूपण करना है । इस प्रसङ्ग में रस और गन्ध इन दोनों
की व्याख्या समान रूप से प्राप्त हो जाती है; किन्तु इन दोनों में गन्ध एक ही द्रव्य
में रहता है और रस दो द्रव्यों में, इस विशेष के कारण रूप के निरूपण के बाद और
गन्ध के निरूपण से पहले 'रसो रसनग्राह्यः' इत्यादि से रस का निरूपण करते हैं । गुणों
में से केवल रस ही रसनेन्द्रिय से गृहीत होता है, अतः रसनेन्द्रिय से गृहीत होने-
वाला गुण ही रस है । 'पृथिव्युदकवृत्तिः' अर्थात् यह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में
रहता है । 'जीवनपुष्टिबलारोग्यनिमित्तम्' प्राण के धारण को 'जीवन' कहते हैं । शरीर
के अवयवों की वृद्धि ही 'पुष्टि' है । विशेष प्रकार के उत्साह को 'बल' कहते हैं ।