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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 202 of 759

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Page 202

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वादीनामकारणत्वम् ।
संयोगविभागशब्दात्मविशेषगुणानां प्रदेशवृत्तित्वम् ।
परत्व, अपरत्व, द्वित्व और द्विपृथक्त्वादि गुण किसी के भी कारण
नहीं हैं ।
संयोग, विभाग, शब्द एवं आत्मा के सभी विशेष गुण ये सभी
प्रादेशिक (अव्याप्यवृत्ति) हैं ।
न्यायकन्दली
कारणम्। नोदनाभिघातः क्रियोत्पत्तौ निमित्तकारणम् । द्रवत्ववेगयोरपि योज्यम् ।
परत्वापरत्वादीनामकारणत्वम् । नैतान्यसमवायिकारणं नापि निमित्तकारणम् । द्वित्व-
द्विपृथक्त्वादीनामित्यादिपदेन त्रिपृथक्त्वानां परमाणुपरिमाणपरममहत्परिमाणयोश्च परिग्रहः ।
संयोगविभागशब्दात्मविशेषगुणानां प्रदेशवृत्तित्वमिति । प्रदेश-
वृत्तयोऽव्याप्यवृत्तयः स्वाश्रये वर्त्तन्ते, न वर्त्तन्ते चेत्यर्थः । नन्वेतदयुक्तम्, युगपदेक-
स्यैकत्र भावाभावविरोधात् । नानुषन्नम्, प्रमाणेन तथाभावप्रतीतेः । तथा हि-
हतो वृक्षस्य पुरुषेण सहाग्रे संयोगो मूले च तदभावः प्रतीयते, मूले वृक्षोप-
लब्धेऽपि संयोगस्य सर्वैरनुपलम्भात् । न च मूलाग्रयोरेव संयोगतदभावौ, तत्रप्रदेशा-
कारण भी है । गुरुत्व अपने आश्रय की पतन क्रिया का असमवायिकारण है एवं
नोदन और अभिघातजनित क्रिया का निमित्तकारण भी है । इसी तरह द्रवत्व
और वेग में भी विचार करना चाहिए ।
परत्व एवं अपरत्व प्रभृति चार गुणों का 'अकारणत्व' साधर्म्य है, अर्थात् ये
न तो असमवायिकारण हैं और न निमित्तकारण ही (समवायिकारण तो द्रव्य से
भिन्न कोई होता ही नहीं है) । 'द्वित्वद्विपृथक्त्वादि' शब्द में प्रयुक्त 'आदि' पद से
त्रिपृथक्त्व, परमाणुओं के परिमाण एवं परममहत्परिमाण प्रभृति को समझना
चाहिए (अर्थात् ये भी किसी के कारण नहीं होते) ।
संयोग, विभाग, शब्द और आत्मा के सभी विशेष गुण, इन सबों का 'प्रदेशवृत्ति-
त्व' साधर्म्य है। 'प्रदेशवृत्ति' शब्द का अर्थ है अव्याप्यवृत्ति, अर्थात् ये अपने आश्रय
(के किसी अंश) में रहें भी, एवं अपने आश्रय (के ही दूसरे किसी अंश ) में न
भी रहें । (प्र.) यह तो ठीक नहीं है; क्योंकि एक ही समय में एक ही आश्रय में एक
ही वस्तु रहे भी और न भी रहे; क्योंकि 'रहना' और 'न रहना' दोनों परस्पर विरोधी
हैं ? (उ.) इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है कि एक ही आश्रय में भाव और अभाव
की उक्त प्रतीति प्रमाण से उत्पन्न होती है। एक ही महावृक्ष के अग्रभाग के साथ पुरुष
के संयोग की प्रतीति होती है, उसी वृक्ष के मूल भाग में उसी पुरुष के संयोग के