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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 199 of 759

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Page 199

२४४ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
गुरुत्वद्रवत्ववेगप्रयत्नधर्माधर्मसंयोगविशेषाः क्रियाहेतवः ।
रूपरसगन्धानुष्णास्पर्शसङ्ख्यापरिमाणैकपृथक्त्वस्नेहशब्दानामसमवायिकारणत्वम् ।
गुरुत्व, द्रवत्व, वेग, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और विशेष प्रकार के
संयोग से सात गुण क्रिया के कारण हैं।
रूप, रस, गन्ध, अनुष्णाशीत स्पर्श, संख्या, परिमाण, एकपृथक्त्व,
स्नेह और शब्द ये नौ गुण असमवायिकारण हैं ।
न्यायकन्दली
गुरुत्वादयः क्रियाहेतवः । गुरुत्वात्पतनं द्रवत्वात् स्यन्दनं वेगादिषोरुत्तरकर्माणि
प्रयत्नाच्छरीरादिक्रिया धर्माधर्माभ्यामन्यादिक्रिया । विशिष्यत इति विशेषः, संयोग एव
विशेषः संयोगविशेषः, विशिष्टः संयोगो नोदनाभिघातलक्षणः, सोऽपि क्रियाहेतुरिति
वक्ष्यते ।
रूपादयः शब्दान्ता असमवायिकारणम् । समवायिकारणप्रत्या-
सन्नमवधृतसामर्थ्यमसमवायिकारणम् । प्रत्यासत्तिश्च समवायिकारणसमवायः समवायि-
कारणैकार्थसमवायश्च । सुखादीनां समवायिकारणमात्मा, तत्र समवाया-
में क्रिया को उत्पन्न करते हैं । धर्म और अधर्म अपने आश्रय में (क्रमशः) सुख
और दुःख को एवं अपने आश्रय से भिन्न अग्नि प्रभृति में ऊर्ध्वज्वलनादि क्रिया
को भी उत्पन्न करते हैं ।
ये गुरुत्वादि सात गुण क्रिया के उत्पादक हैं। इनमें गुरुत्व से पतनरूप क्रिया,
द्रवत्व से प्रसरणरूप क्रिया, वेग से तीर प्रभृति की उत्तर क्रियायें, प्रयत्न से शरीर
की क्रिया, धर्म और अधर्म से अग्नि प्रभृति में ऊर्ध्वज्वलनादि क्रियायें होती हैं ।
'संयोग एव विशेषः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार नोदन एवं अभिघातरूप विशेष
प्रकार के संयोग ही प्रकृत 'संयोगविशेष' शब्द से इष्ट हैं । आगे कहेंगे कि ये
दोनों ही प्रकार के संयोग क्रिया के कारण हैं ।
रूप से लेकर शब्दपर्यन्त कथित ये सात गुण असमवायिकारण हैं । समवायिकारण
में 'प्रत्यासन्न' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध जिस वस्तु में कार्य करने का सामर्थ्य
निश्चित है, वही असमवायिकारण है । कार्यों के साथ अन्वय (अर्थात् कारण के
अव्यवहित क्षण में कार्य का अवश्य रहना) एवं व्यतिरेक (अर्थात् जिसके न रहने पर
कार्य उत्पन्न ही न हों) यही दोनों कारणों में कार्य के उत्पादन का सामर्थ्य है । 'प्रत्यासन्न'
शब्द में प्रयुक्त 'प्रत्यासत्ति' शब्द समवायिकारणानुयोगिक समवाय सम्बन्ध का वाचक
है । यह समवायरूप सम्बन्ध प्रकृत में दो प्रकार का है- (१) समवायिकारणानुयोगिक