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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 193 of 759

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Page 193

२३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दा अकारणगुणपूर्वकाः ।
बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दतूलपरिमाणोत्तरसंयोगनैमित्तिक-
द्रव्यत्वपरत्वापरत्वपाकजाः संयोगजाः ।
बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और
शब्द ये दश गुण 'अकारणगुणपूर्वक' हैं (अर्थात् ये अपने आश्रयों के
अवयवों में रहनेवाले अपने समानजातीय गुण से नहीं उत्पन्न होते) ।
बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना, शब्द,
रूई प्रभृति के परिमाण, उत्तरदेश के साथ संयोग, नैमित्तिक द्रवत्व ये
तेरह गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं ।
न्यायकन्दली
रूपादीनां चोत्पत्तिरेव नास्तीति न व्यभिचारः । एषां कारणगुणपूर्वकत्वाभिधानं स्वरूप-
कथनं न त्ववधारणार्थम्, नैमित्तिकद्रवत्ववेगयोरकारणगुणपूर्वकत्वस्यापि सम्भवात् । कारण-
गुणपूर्वकत्वमनयोर्वेगवदारब्धजलावयविसमवेतयोर्द्रष्टव्यम् ।
बुद्ध्यादयः शब्दान्ता अकारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तद्गुण-
पूर्वका न भवन्ति, नित्यगुणत्वात् ।
बुद्ध्यादयः संयोगजाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावना
आत्ममनःसंयोगजाः । शब्दो भेर्याकाशसंयोगजः । तूलपरिमाणं प्रचयसंयोगजम् ।
इस नियम का यह अभिप्राय नहीं है कि ये सभी गुण कारणगुणपूर्वक ही होते हैं;
क्योंकि नैमित्तिक द्रवत्व और वेग अकारणगुणपूर्वक भी होते हैं । वेग एवं द्रवत्व
से युक्त अवयवों के द्वारा उत्पन्न जल रूप अवयवी के वेग और द्रवत्व में कथित
कारणगुणपूर्वकत्व समझना चाहिए ।
बुद्धि से लेकर शब्दपर्यन्त कथित ये नौ गुण 'अकारणगुणपूर्वक' हैं, अर्थात्
अपने आश्रयरूप द्रव्य के समवायिकारण में रहनेवाले गुण से नहीं उत्पन्न होते;
क्योंकि इनके आश्रय नित्य हैं । इन गुणों के समवायिकारणों का कोई कारण ही
नहीं है ।
'बुद्धि प्रभृति कथित गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं', इनमें बुद्धि, सुख, दुःख,
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और भावना, ये नौ गुण आत्मा और मन के संयोग
से उत्पन्न होते हैं । शब्द की उत्पत्ति भेरी (नगाड़ा) और आकाश के संयोग से होती
है । 'प्रचय' नाम के संयोग से रूई के परिमाण की उत्पत्ति होती है । संयोगज