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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished261 pages

Page 230 of 261

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Page 230

२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल एवं भाष्य]

न्तरतममानन्दं ब्रह्म विज्ञातवां-
स्तपसैव साधनेन भृगुः । तस्माद्ब्र-
ह्मविजिज्ञासुना बाह्यान्तःकरण-
समाधानलक्षणं परमं तपःसाधन-
मनुष्ठेयमिति प्रकरणार्थः ।

अधुनाख्यायिकातोऽपसृत्य
श्रुतिः स्वेन वचनेनाख्यायिका-
निर्वर्त्यमर्थमाचष्टे—सैषा भार्गवी
भृगुणा विदिता वरुणेन प्रोक्ता
वारुणी विद्या परमे व्योमन्हृदया-
काशगुहायां परम आनन्देऽद्वैते
प्रतिष्ठिता परिसमाप्तान्नमयादात्म-
नोऽधिप्रवृत्ता । य एवमन्योऽपि
तपसैव साधनेनानेनैव क्रमेणा-
नुप्रविश्यानन्दं ब्रह्म वेद स एवं
विद्याप्रतिष्ठानात्प्रतितिष्ठत्यानन्दे
परमे ब्रह्मणि ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ।

दृष्टं च फलं तस्योच्यते—
अन्नवान्प्रभूतमन्नमस्य विद्यत


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

द्वारा ही सबकी अपेक्षा अन्तरतम
आनन्दको ब्रह्म जाना । अतः जो
ब्रह्मको जाननेकी इच्छावाला हो उसे
साधनरूपसे बाह्य इन्द्रिय और
अन्तःकरणका समाधानरूप परम
तप ही करना चाहिये—यह इस
प्रकरणका तात्पर्य है ।

अब आख्यायिकासे निवृत्त होकर
श्रुति अपने ही वाक्यसे आख्यायिका-
से निष्पन्न होनेवाला अर्थ बतलाती
है—अन्नमय आत्मासे प्रारम्भ हुई
यह भार्गवी—भृगुकी जानी हुई और
वारुणी—वरुणकी कही हुई विद्या
परमाकाशमें—हृदयाकाशस्थित गुहा-
के भीतर अद्वैत परमानन्दमें प्रतिष्ठित
है अर्थात् वहीं इसका पर्यवसान
होता है । इसी प्रकार जो कोई
दूसरा पुरुष भी इसी क्रमसे तपरूप
साधनके द्वारा क्रमशः अनुप्रवेश
करके आनन्दको ब्रह्मरूपसे जानता
है वह इस प्रकार विद्यामें
स्थिति लाभ करनेसे आनन्द अर्थात्
परब्रह्ममें स्थिति प्राप्त करता है, यानी
ब्रह्म ही हो जाता है ।

अब उसका दृष्ट ( इस लोकमें
प्राप्त होनेवाला ) फल बतलाया
जाता है—अन्नवान्—जिसके पास


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri