तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 215 of 261
Read in context[अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
[मूल संस्कृत (वाम भाग)]
वस्तुविषयाणि वस्तुसामान्या-
न्निर्विकल्पेऽद्वयेऽपि ब्रह्मणि प्रयो-
क्तृभिः प्रकाशनाय प्रयुज्यमाना-
न्यप्राप्याप्रकाशयैव निवर्तन्ते
स्वसामर्थ्याद्धीयन्ते—
मन इति प्रत्ययो विज्ञानम् ।
तच्च यत्राभिधानं प्रवृत्तमतीन्द्रि-
येऽप्यर्थे तदर्थे च प्रवर्तते प्रका-
शनाय । यत्र च विज्ञानं तत्र
वाचः प्रवृत्तिः । तस्मात्सहैव
वाङ्मनसयोरभिधानप्रत्यययोः
प्रवृत्तिः सर्वत्र ।
तस्माद्ब्रह्मप्रकाशनाय सर्वथा
प्रयोक्तृभिः प्रयुज्यमाना अपि
वाचो यस्मादप्रत्ययविषयादन-
भिधेयाददृश्यादिविशेषणात्सहैव
मनसा विज्ञानेन सर्वप्रकाशन-
समर्थेन निवर्तन्ते तं ब्रह्मण आ-
नन्दं श्रोत्रियस्यावृजिनस्याकामह-
तै० उ० २७–२८--
[हिन्दी भाष्यार्थ (दक्षिण भाग)]
अन्य सविकल्प वस्तुओंके ] समान
समझनेके कारण वक्ताओंद्वारा, ब्रह्म-
के निर्विकल्प और अद्वैत होनेपर
भी, उसका निर्देश करनेके लिये
प्रयोग किया जाता है, उसे न
पाकर अर्थात् उसे प्रकाशित किये
बिना ही लौट आता है—अपनी
सामर्थ्यसे च्युत हो जाता है—
[ 'मनसा सह' ( मनके सहित )
इस पदसमूहमें ] 'मन' शब्द प्रत्यय
अर्थात् विज्ञानका वाचक है । वह,
जहाँ-कहीं अतीन्द्रिय पदार्थोंमें भी
शब्दकी प्रवृत्ति होती है वहीं उसे
प्रकाशित करनेके लिये प्रवृत्त हुआ
करता है । जहाँ-कहीं भी विज्ञान
है वहीं वाणीकी भी प्रवृत्ति है ।
अतः अभिधान और प्रत्ययरूप
वाणी और मनकी सर्वत्र साथ-साथ
ही प्रवृत्ति होती है ।
इसलिये वक्ताओंद्वारा सर्वथा
ब्रह्मका प्रकाश करनेके लिये ही
प्रयोग की हुई वाणी, जिस प्रतीतिके
अविषयभूत, अकथनीय, अदृश्य और
निर्विशेष ब्रह्मके पाससे मन अर्थात्
सबको प्रकाशित करनेमें समर्थ
विज्ञानके सहित लौट आती है उस
ब्रह्मके आनन्दको—श्रोत्रिय निष्पाप