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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished261 pages

Page 198 of 261

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Page 198

१९२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

[मूल/भाष्य - वाम भाग]
न्तं तदेवानुप्रविष्टः स य इति
निर्दिश्यते । कोऽसौ ? अयं पुरुषे,
यश्चासावादित्ये यः परमानन्दः
श्रोत्रियप्रत्यक्षो निर्दिष्टो यस्यैक-
देशं ब्रह्मादीनि भूतानि सुखा-
र्हाण्युपजीवन्ति स यश्चासावा-
दित्य इति निर्दिश्यते । स एको
भिन्नप्रदेशस्थघटाकाशैकत्ववत् ।
ननु तन्निर्देशे स यश्चायं
पुरुष इत्यविशेषतोऽध्यात्मं न
युक्तो निर्देशः, यश्चायं दक्षिणे-
ऽक्षन्निति तु युक्तः, प्रसिद्धत्वात् ।
न, पराधिकारात् । परो
ह्यात्मात्राधिकृतोऽदृश्येऽनात्म्ये
भीषास्माद्वातः पवते सैषानन्दस्य
मीमांसेति । न ह्यकस्मादप्रकृतो


[अनुवाद - दक्षिण भाग]
उसीका 'स यः' ( वह जो ) इन
पदोंद्वारा निर्देश किया जाता है ।
वह कौन है ? जो इस पुरुषमें है
और जो श्रोत्रियके लिये प्रत्यक्ष
बतलाया हुआ परमानन्द आदित्यमें
है; जिसके एक देशके आश्रयसे ही
सुखके पात्रीभूत ब्रह्मा आदि जीव
जीवन धारण करते हैं उसी आनन्द-
को 'स यश्चासावादित्ये' इन पदों-
द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है ।
भिन्न-प्रदेशस्थ घटाकाश और
महाकाशके एकत्वके समान [ उन
दोनों उपाधियोंमें स्थित ] वह
आनन्द एक है ।
शङ्का—किन्तु उस आनन्दका
निर्देश करनेमें 'वह जो इस पुरुषमें
है' इस प्रकार सामान्यरूपसे अध्यात्म
पुरुषका निर्देश करना उचित नहीं
है, बल्कि 'जो इस दक्षिण नेत्रमें है'
इस प्रकार कहना ही उचित है;
क्योंकि ऐसा ही प्रसिद्ध है ।
समाधान--नहीं, क्योंकि यहाँपर
आत्माका अधिकरण है । 'अदृश्ये-
ऽनात्म्ये' 'भीषास्माद्वातः पवते' तथा
'सैषानन्दस्य मीमांसा' आदि वाक्यों-
के अनुसार यहाँ परमात्माका ही
प्रकरण है । अतः जिसका कोई
प्रसङ्ग नहीं है उस [ दक्षिणनेत्रस्थ


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri