तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context१७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
समय यह अभयको प्राप्त हो जाता है; और जब यह इसमें थोड़ा-सा
भी भेद करता है तो इसे भय प्राप्त होता है। वह ब्रह्म ही भेददर्शी
विद्वान्के लिये भयरूप है। इसी अर्थमें यह श्लोक है ॥ १ ॥
[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]
असद्वा इदमग्र आसीत् ।
(टिप्पणी: असच्छब्दवाच्याव्याकृताज्जगदुत्पत्तिः)
असदिति व्याकृत-
नामरूपविशेषविप-
रीतरूपमव्याकृतं
ब्रह्मोच्यते । न पुनरत्यन्तमेवा-
सत् । न ह्यसतः सज्जन्मास्ति
इदमिति नामरूपविशेषवद्व्याकृतं
जगदग्रे पूर्वं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मैवास-
च्छब्दवाच्यमासीत् । ततोऽसतो
वै सत्प्रविभक्तनामरूपविशेष-
मजायतोत्पन्नम् ।
किं ततः प्रविभक्तं कार्यमिति
पितुरिव पुत्रः, नेत्याह । तदस-
च्छब्दवाच्यं स्वयमेवात्मानमेवा-
कुरुत कृतवत् । यस्मादेवं तस्मा-
द्ब्रह्मैव सुकृतं स्वयंकर्तृच्यते ।
स्वयंकर्तृ ब्रह्मेति प्रसिद्धं लोके
सर्वकारणत्वात् ।
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या]
पहले यह [ जगत् ] असत् ही
था। 'असत्' इस शब्दसे, जिनके
नाम-रूप व्यक्त हो गये हैं उन
विशेष पदार्थोंसे विपरीत स्वभाववाला
अव्याकृत ब्रह्म कहा जाता है।
इससे [ वन्ध्यापुत्रादि ] अत्यन्त
असत् पदार्थ बतलाये जाने अभीष्ट
नहीं हैं; क्योंकि असत्से सत्का
जन्म नहीं हो सकता । 'इदम्'
अर्थात् नाम-रूप विशेषसे युक्त
व्याकृत जगत् अग्रे—पहले अर्थात्
उत्पत्तिसे पूर्व 'असत्' शब्दवाच्य
ब्रह्म ही था । उस असत्से ही
सत् यानी जिसके नाम-रूपका
विभाग हो गया है उस विशेषकी
उत्पत्ति हुई ।
तो क्या पितासे पुत्रके समान
यह कार्यवर्ग उस [ ब्रह्म ] से विभिन्न
है ? इसपर श्रुति कहती है—नहीं;
उस 'असत्' शब्दवाच्य ब्रह्मने स्वयं
अपनेको ही रचा । क्योंकि ऐसी
बात है इसलिये वह ब्रह्म ही सुकृत
अर्थात् स्वयंकर्ता कहा जाता है;
सबका कारण होनेसे ब्रह्म स्वयं कर्ता
है—यह बात लोकमें प्रसिद्ध है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri