तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context१६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
मयस्तदन्तर्मनोमयो विज्ञानमय | उसका अन्तर्वर्ती मनोमय और फिर
इति विज्ञानगुहायां प्रवेशितस्तत्र | विज्ञानमय है । इस प्रकार आत्माका
चानन्दमयो विशिष्ट आत्मा | विज्ञानगुहामें प्रवेश करा दिया गया
प्रदर्शितः । | है और वहाँ आनन्दमय ऐसे विशिष्ट
| आत्माको प्रदर्शित किया गया है ।
अतः परमानन्दमयलिङ्गाधि- | इसके आगे आनन्दमय-इस
गमद्वारेणानन्दविवृद्ध्यवसान | लिङ्गके ज्ञानद्वारा आनन्दके उत्कर्ष-
आत्मा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा सर्व- | का अवसानभूत आत्मा जो सम्पूर्ण
विकल्पास्पदो निर्विकल्पोऽस्या- | विकल्पका आश्रयभूत एवं निर्विकल्प
मेव गुहायामधिगन्तव्य इति | ब्रह्म है तथा [ आनन्दमय कोशकी ]
तत्प्रवेशः प्रकल्प्यते । न ह्यन्य- | पुच्छ प्रतिष्ठा है, वह इस गुहामें ही
त्रोपलभ्यते ब्रह्म निर्विशेषत्वात् । | अनुभव किये जाने योग्य है-
विशेषसंबन्धो ह्युपलब्धिहेतु- | इसलिये उसके प्रवेशकी कल्पना
र्दृष्टः, यथा राहेश्चन्द्रार्कविशिष्ट- | की गयी है । निर्विशेष होनेके कारण
संबन्धः । एवमन्तःकरणगुहात्म- | ब्रह्म [ बुद्धिरूप गुहाके सिवा ] और
संबन्धो ब्रह्मण उपलब्धिहेतुः । | कहीं उपलब्ध नहीं होता; क्योंकि
संनिकर्षादवभासात्मकत्वाच्चान्तः- | विशेषका सम्बन्ध ही उपलब्धिमें हेतु
करणस्य । | देखा गया है, जिस प्रकार कि राहु-
| की उपलब्धिमें चन्द्रमा अथवा सूर्य-
| रूप विशेषका सम्बन्ध । इस प्रकार
| अन्तःकरणरूप गुहा और आत्मा-
| का सम्बन्ध ही ब्रह्मकी उपलब्धिका
| हेतु है; क्योंकि अन्तःकरण उसका
| समीपवर्ती और प्रकाशस्वरूप* है ।
※ जिस प्रकार अन्धकार और प्रकाश दोनों ही जड हैं, तथापि प्रकाश
अन्धकाररूप आवरणको दूर करनेमें समर्थ है, इसी प्रकार यद्यपि अज्ञान और
अन्तःकरण दोनों ही समानरूपसे जड हैं तो भी प्रत्यय ( विभिन्न प्रतीतियोंके )
रूपमें परिणत हुआ अन्तःकरण अज्ञानका नाश करनेमें समर्थ है और इस
प्रकार वह आत्माका प्रकाशक ( ज्ञान करानेवाला ) है । इसी बातको आगेके
भाष्यसे स्पष्ट करते हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri