स्वप्नदोष चिकित्सा
Swapnadosh Chikitsa
by स्वामी ओमानन्द सरस्वती
Source: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (origin)
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स्वप्रदोष की चिकित्सा
है कि स्वप्रदोष में तो वह वीर्य जो हजम होने (पचने) से बच जाता है अर्थात् शरीर का अंग नहीं बनता, नष्ट होता वा बाहर निकलता है। किन्तु विषयभोग वा मैथुन से एक भयंकर धक्का सारे शरीर पर लगता है। जो वीर्य शरीर का अंग बन चुका होता है वह पिण्डल-पिण्डलकर पतला होकर निकलता है और स्वप्रदोष की अपेक्षा अधिक मात्रा में निकलता है। मैथुन से स्वप्रदोष की अपेक्षा बहुत अधिक भयंकर हानि होती है। मैथुन से तो स्वप्रदोषों की संख्या और बढ़ जाती है और प्रमेहादि भयङ्कर रोग उत्पन्न होजाते हैं जो मृत्यु का कारण बन जाते हैं। अतः इस भयानक भ्रम में फँस विनाश के गढ़े में पड़कर मृत्यु को न बुलाओ और मैथुनों से सर्वथा दूर रहो।
कई मूर्ख डाक्टर यह कहते हैं कि स्वप्रदोषादि के द्वारा वीर्य का निकल जाना स्वाभाविक है और इससे कोई हानि नहीं होती। यह अत्यन्त मिथ्याकल्पना है। वीर्य की दो गति हैं—(१) अधोगति (नीचे को जाना), (२) ऊर्ध्वगति (ऊपर को जाना)। जिस प्रकार शरीर को रस रक्त आदि अन्य छः धातुवें धारण करती हैं और शरीर का अंग बनजाती हैं, कभी बिना निकाले बाहर नहीं निकलतीं। इसी प्रकार वीर्य जैसा अमूल्य तत्त्व, जो सब धातुओं का सार है, जिसमें आश्चर्यनक शक्ति है, वह मनुष्य की इच्छा और भूल किये बिना बाहर नहीं निकल सकता। वीर्य का शरीर से स्वयं बाहर निकलना तो दूर की बात है, किन्तु (रोग के आतुरिक) मल-मूत्र भी तो बिना इच्छा के बाहर नहीं निकलता। अतः स्वप्रदोष जिसमें अनजाने वीर्य निकलता है, सर्वथा अस्वाभाविक वा रुग्णावस्था है। पूर्ण युवावस्था में शरीर में वीर्य की उत्पत्ति पर्याप्तमात्रा में होती है। जब आरम्भ में कभी-कभी स्वप्रदोष द्वारा शरीर से वीर्य निकलता है तो उससे हानि वा बुरा प्रभाव दिखाई नहीं देता। नया उत्पन्न होनेवाला वीर्य इस थोड़ीसी हानि की पूर्ति कर देता है। मूर्ख मनुष्य यह समझने लगता है—मुझे कोई हानि नहीं हुई। वीर्य के एक बिन्दु का नाश भी हानिकारक है और मृत्यु की ओर लेजानावाला है। जो बालक धार्मिक माता-पिता की सन्तान है आरम्भ से जिसे सदाचार की शिक्षा दीजाती है। सदा सत्सङ्ग तथा अच्छे साथियों के साथ रहता है, शुद्ध और सात्विक भोजन करता है, व्यायाम प्राणायामादि ब्रह्मचर्य के सभी नियमों का पालन करता है, वह सौ वर्ष वा इससे भी अधिक जब तक वह जीवित रहता है, उसे कभी भी स्वप्रदोष नहीं होगा। उसका वीर्य उसके शरीर के अन्दर ही खप जाता है। अर्थात् शारीरिक बल व शक्ति का रूप धारण करता है। उसके वीर्य की सदा ऊर्ध्वगति रहती है। जिस प्रकार जलते हुए दीपक का तैल वर्तिका (बत्ती) के सहारे ऊपर चढ़कर प्रकाश के रूप में बदल जाता है, उसी प्रकार शुद्ध आहार व्यवहार, व्यायाम और प्राणायाम द्वारा यह शरीर का अङ्ग बनकर बल व शक्ति का रूप धारण करता है। अथवा विचाराग्नि में जलकर मस्तिष्क व बुद्धि का रूप धारण करता है और विद्या के