स्वप्नदोष चिकित्सा
Swapnadosh Chikitsa
by स्वामी ओमानन्द सरस्वती
Source: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (origin)
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Read in contextवैदिक पुस्तकालय
दुष्टविचारों का परित्याग
( ४३९ )
खाने पीने का विचार हमें दिन में भी कभी नहीं आता। हमें इनसे अत्यन्त घृणा है। इसी प्रकार जिन विचारों व कार्यों से हम दिन में घृणा करते हैं वा मन में स्थान नहीं देते उनके स्वप्न भी हमें रात्रि में नहीं आते। हम तो दिन में उपन्यास नाविल आदि गन्दी पुस्तकें पढ़ते हैं। नीच (गिरे हुये) साथियों के साथ मिलते-जुलते, खेलते-कूदते तथा खाली पड़े रहते हैं। इस प्रकार दिन में पर्याप्त गन्दी सामग्री हमारे मन को स्वप्न अवस्था के लिये मिल जाती है। जो गन्दे स्वप्नों वा स्वप्नदोष से बचना चाहता है उसे चाहिये कि दिन में सावधान रहे। बुरे विचारों को मन में न आने दे तो रात को स्वयं बचा रहेगा। जो दिन में गन्दे विचारों का स्वागत करते हैं, सोते समय भी वे विचार उनके मन को घेर लेते हैं। जैसे आपके घर पर यदि कोई अतिथि (बटेऊ) आता है और आप उसका यथायोग्य भोजन आदि से आदर सत्कार करते हैं तो उसकी आपके यहां आने की फिर भी इच्छा होती है। यदि आप उसका तिरस्कार निरादर कर दें वा उसके लिये अपना द्वार बन्द कर दें तो वह फिर कभी भी न आयेगा। इसी प्रकार जिन विचारों का हम स्वागत वा आदर करते हैं, वे बार-बार हमारे मन में आते हैं। यदि हम गन्दे विचारों का तिरस्कार तथा इनसे घृणा करें तो ये हमारे पास आना छोड़ देंगे। यदि कोई गन्दा विचार आये, उसे धिक्कार दो। उत्साहपूर्वक कहो ओ! गन्दे विचार दूर भाग। हमारा द्वार तेरे लिये बन्द है। इस प्रकार अभ्यास करने से हमारा मन जागते समय गड़दों में नहीं गिरने पायेगा। इससे हम स्वप्नावस्था में भी बचे रहेंगे। दुष्टविचार हमारे सबसे बड़े और भयंकर शत्रु हैं।
यदि हमारे शरीर पर कोई शत्रु कुल्हाड़े, तलवार आदि किसी शस्त्र का प्रहार वा वार करे तो क्या निकलेगा, रक्त (खून)। किन्तु एक युवक जो आज अखण्ड ब्रह्मचारी है, वह कुछ दिन वा एकाध मास कुसङ्ग में रहजाये, गन्दी बातें कहे सुने वा देखे तो उसका मन गन्दे विचारों का स्थान बन जायेगा। मन व शरीर में उष्णता (गर्मी) और उत्तेजना पैदा होगी, दुष्टविचार उसके सारे शरीर को मथ वा बिलो डालेंगे। जो वीर्य सारे शरीर में रमा हुआ था, जिसका शरीर से बाहर बिलो डालेंगे। जो वीर्य सारे शरीर में रमा हुआ था, जिसका शरीर से बाहर निकलना एक मास पूर्व असम्भव था, आज वह गन्दे विचारों की उष्णता से अनायास ही शरीर से बाहर निकलने लगता है। वीर्य की अधोगति होजाती है। वीर्य पतला पड़ जाता है और नीचे की ओर बहने लगता है। जैसे दूध को बिलोने से घी बाहर (ऊपर) आजाता है, उसी प्रकार दुष्टविचारों का प्रहार (चोट) तलवार आदि शास्त्रों से भी अधिक घातक तथा भयङ्कर है, जो एक सदाचारी युवक के ब्रह्मचर्य को भी नष्ट कर डालता है। वीर्य के लिये शुद्ध और पवित्र विचारों से बढ़कर कोई सहायक नहीं। जागृत अवस्था में जिन्हें हम विचार कहते हैं, वे सोते हुए स्वप्न का रूप धारण करते हैं। दिन में गन्दे विचारों से काम-अग्नि भड़क उठती है। उसके फलस्वरूप रात को स्वप्नदोष होकर ही रहता है।
इसलिये दिन में कोई भी कार्य ऐसा न करो जिससे आपके मन में कोई