स्वप्नदोष चिकित्सा
Swapnadosh Chikitsa
by स्वामी ओमानन्द सरस्वती
Source: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (origin)
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स्वप्रदोष की चिकित्सा
एक छटांक (लकड़ी नहीं केवल बीज ही लेने हैं), इन सबको बारीक पीसकर कपड़छान कर लो। इसमें तीन छटांक खांड वा मिसरी मिला लो। यह सबके लिये अत्यन्त आवश्यक है। स्वप्रदोष को यह औषध अवश्यमेव दूर करती है। कितने ही अच्छे-अच्छे वैद्यों ने इसे हजारों बार अनुभव किया है। यह औषध ऐसे युवकों के लिये जो स्कूल वा कालेज आदि में पढ़ते हों वा अविवाहित हों, बहुत ही लाभदायक सिद्ध होता है। किन्तु इतना ध्यान रखना चाहिये यदि स्वप्रदोष का रोगी शरीर से बलवान् है और साथ ही ब्रह्मचारी है जिसके शरीर में वीर्य पर्याप्तमात्रा में है, ऐसे युवक वा विद्यार्थी को स्वप्रदोष वीर्य की अधिकता के कारण हो तो उसे ताजेजल के साथ ही दो वा तीन माशे से अधिक नहीं दें। किन्तु जो रोगी अपने हाथों अपना सर्वनाश कर चुका हो और इसी प्रकार की गुदामैथुनादि कुटेवों के कारण इस स्वप्रदोष को खरीदा हो, उसे पहिले तो सब बुराइयाँ छोड़ देनी चाहिए। फिर वह इस औषध को तीन माशे से छः माशे तक दोनों समय ताजा धारोष्ण गोदुग्ध (ताजा निकले हुए गाय के दूध) के साथ प्रयोग करे। इससे स्वप्रदोष ही दूर नहीं होता इससे शरीर में वीर्य की वृद्धि पर्याप्तमात्रा में होती है। वीर्य गाढ़ा हो जाता है। खूब बल और शक्ति बढ़ती है। यह औषध रामबाण है।
(३) आयुर्वेदिक फार्मसी, गुरुकुल झज्जर ने स्वप्रदोषचिकित्सा के लिये स्वप्रदोषामृत नामक औषध का निर्माण किया है। अनेक रोगियों पर हमने प्रयोग करके देखा है, वह स्वप्रदोष के रोगियों को अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हुई है।
७-शीर्षासन तथा व्यायाम
व्यायाम किये बिना वीर्य-रक्षा असम्भव है। व्यायाम से वीर्य शरीर का अङ्ग बन जाता है। स्वप्रदोषादि विकार बहुत कुछ व्यायाम से ही दूर होजाते हैं। व्यायाम में शीर्षासन तो स्वप्रदोष तथा प्रमेह की अच्छूक औषध है। शीर्षासन दस सैकिंड से आरम्भ करके शनैः-शनैः प्रतिदिन बढ़ाये। बढ़ाते समय अपनी शक्ति और भोजन का ध्यान रखें। यह अनुभवसिद्ध है जब शीर्षासन का १० वा १५ मिनट तक अभ्यास होजाता है तो स्वप्रदोष तथा वीर्यसम्बन्धी सभी रोग दूर भाग जाते हैं। स्वास्थ्य आदर्श तथा मुख तेजस्वी होजाता है। बुद्धि और मस्तिष्क की शक्ति की वृद्धि होती है। शीर्षासन सब व्यायामों से पूर्व करो तथा दोनों समय (शौच से पीछे) शिर के नीचे कपड़े की गद्दी रखकर करो। इसकी पूरी विधि किसी पुस्तक में देख लो।
यह लेख संक्षेप से लिखा है, तदर्थ सचेत रहें। किन्तु जो साधन स्वप्रदोष को दूर करने के लिये लिखे हैं वे सुने-सुनाये नहीं अपितु अनेक रोगियों पर अनुभव कियेगये हैं। आप स्वयं परीक्षण करके देखोगे तो सारी आयु ऋषियों के गुण गाते-गाते नहीं थकोगे। यदि कुछ भी विद्यार्थियों वा युवकों ने इस लेख से लाभ उठाया तो मैं अपने को कृतार्थ समझूंगा।
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