Skip to content
SarvaKosh
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

by आचार्य चतुरसेन शास्त्री

Source: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (origin)

DevanagariHindipublished222 pages

Page 14 of 222

Read in context
Page 14

६

हमारे रहने का घर

हमारी दोनों आँखें इस घर की खिड़कियाँ हैं, ये बड़ी
वारीकी से बनी हैं और हरेक चीज़ इन्हींके
खिड़कियाँ द्वारा हम देख लेते हैं।

सन्देश पाने के द्वार दो हैं, जो कान कहाते हैं। इनसे शब्द को
हम पहचानते हैं। कान में एक वारीकफिल्मी
सन्देश पाने के द्वार का पर्दा है जिसमें शब्द टकराता है तो हमें
उसका ज्ञान हो जाता है। कान में तिनका देने से यह पर्दा फट
जाता है और हम बहरे हो जाते हैं।

घर का बड़ा दर्वाजा मुँह है। इसीसे भोजन भीतर आता है, यह
दर्वाजा चन्द रहे तो शरीर गिर जायगा। इसके भीतर स्वाद को
घर का बड़ा दर्वाजा परखनेवाली जीभ है। जब खाना दाँतों की
चक्की में पीसकर मुँह की लार से तर किया
जाता है तो जीभ के सहारे गीला होकर गले से उतरकर भीतर जाता
है। अच्छे भोजन की जाँच तीन चाँकीदार करते हैं। पहले आँख
देख लेती हैं, फिर नाक सूँघ लेता है, और तब जीभ परख लेती है,
तब खाना हम पसन्द करते हैं।

इस तरह यह कारीगरी का घर है, जिसका कोई मोल-तोल नहीं
हो सकता है।