श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
by लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
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यह समझ हो गई, केवल 'महाभारत' ही एक भारत ग्रंथ है ; वर्तमान महाभारतकी
पोथीमेंभी यह वर्णन मिलता है, कि व्यासजीने पहले अपने पुत्र - शुक - को और
अनंतर अपने अन्य शिष्योंको भारत पढ़ाया था ( आ. १. १०३ ); और
आगे यहभी कहा, कि सुमंतु, जैमिनि, पैल, शुक और वैशंपायन इन पाँच शिष्योंने
पाँच भिन्न भिन्न भारतसंहिताओंकी अथवा महाभारतोंकी रचना की ( आ. ६३.
९० ) । इस विषयमें यह कथा पाई जाती है, कि इन पाँच महाभारतोंमेंसे वैशंपायनके
महाभारतको और जैमिनीके महाभारतसे केवल अश्वमेधपर्वहीको व्यासजीने रख
लिया । इससे अब यहभी मालूम हो जाता है, कि ऋषितर्पणमें 'भारत-महाभारत'
शब्दोंके पहले सुमंतु आदि नाम क्यों रखे गये हैं। परंतु यहाँ इस विषयके इतने गहरे
विचारका कोई प्रयोजन नहीं । रा. ब. चिंतामणराव वैद्यने महाभारतके अपने टीका-
ग्रंथमें इस विषयका विचार करके जो सिद्धान्त स्थापित किया है, वही हमें संयु-
क्तिक मालूम होता है । अतएव यहाँ परइतना कह देनाही यथेष्ट होगा, कि वर्तमान
समयमें जो महाभारत उपलब्ध है, वह मूलमें वैसाही न था; भारत या महा-
भारतके अनेक रूपांतर हो गये हैं; और उस ग्रंथको जो अंतिम स्वरूप प्राप्त हुआ,
वह हमारा वर्तमान महाभारत है। यह नहीं कहा जा सकता, कि मूल भारतमेंभी
गीता न रही होगी । हाँ, यह प्रकट है कि सनत्सुजातीय, विदुरनीति, शुकानुप्रश्न,
याज्ञवल्क्य-जनक-संवाद, विष्णुसहस्रनाम, अनुगीता, नारायणीय धर्म आदि प्रकरणोंके
समानही वर्तमान गीताकोभी महाभारतकारने पहले ग्रंथोंके आधारपरही लिखा
है – नई रचना नहीं की है । तथापि, यहभी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, कि
मूल गीतामें महाभारतकारने कुछभी हेरफेर न किया होगा । उपर्युक्त विवेचनसे यह
बात सहजही समझमें आ सकती है, कि वर्तमान सात सौ श्लोकोंकी गीता वर्तमान
महाभारतहीका एक भाग है; दोनोंकी रचनाभी एकनेही की है; और वर्तमान महा-
भारतमें वर्तमान गीताको किसीने बादमें मिला नहीं दिया है । आगे यहभी बतलाया
जायगा, कि वर्तमान महाभारतका समय कौन-सा है, और मूल गीताके विषयमें
हमारा मत क्या है ।
भाग २ - गीता और उपनिषद्
अब देखना चाहिये, कि गीता और भिन्न भिन्न उपनिषदोंका परस्पर संबंध
क्या है । वर्तमान महाभारतहीमें स्थान-स्थानपर सामान्य रीतिसे उपनिषदोंका
उल्लेख किया गया है; और बृहदारण्यक ( बृ. १. ३ ) तथा छांदोग्य ( छां.
१. २ ) में वर्णित प्राणेंद्रियोंके युद्धका हालभी अनुगीता ( अश्व. २३ ) मेंभी है; तथा
“ न मे स्तेनो जनपदे ” आदि कैकेय-अश्वपति राजाके मुखसे निकले हुए शब्दभी
( छां. ५. ११. ५ ) शांतिपर्वमें उक्त राजाकी कथाका वर्णन करते समय ज्यों-के-
त्यों पाये जाते हैं ( शा. ७७. ८ ) । इसी प्रकार शांतिपर्वके जनक-पंचशिख-संवादमें