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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

by लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

DevanagariHindipublished956 pages

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Page 393

३४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
लोकके व्यवहारोंको जारी रखनेके लिये उपरोक्त कर्म करनेही चाहिये। यह प्रकट
है, कि उपनिषदोंमें वर्णित इन दो मार्गोंमेंसे दूसरा मार्गही गीतामें प्रतिपादित है
(गीता ५. २)। परंतु यद्यपि यह कहें, कि मोक्षके अधिकारी ज्ञानी पुरुषको निष्काम
बुद्धिसे लोकसंग्रहार्थ सब व्यवहार करने चाहिये; तथापि इस स्थानपर यह शंका
आपही उत्पन्न होती है, कि जिन यज्ञयाग आदि कर्मोंका फल स्वर्गप्राप्तिके सिवा
दूसरा कुछ नहीं, उन्हें वह करेही क्यों ? इसीसे अठारहवें अध्यायके आरंभमें इसी
शंकाको उपस्थित कर भगवानने स्पष्ट निर्णयकर दिया है, कि ‘यज्ञ, दान, तप’
आदि कर्म सदैव चित्तशुद्धिकारक अर्थात् निष्काम बुद्धि उपजाने और बढ़ानेवाले
हैं, इसलिये 'इन्हेंभी' (एतान्यपि) अन्य निष्काम कर्मोंके समानही लोकसंग्रहार्थ
ज्ञानी पुरुषको फलाशा और संग छोड़कर सदा करते रहना चाहिये (गीता १८. ६)।
परमेश्वरको अर्पणकर इस प्रकार सब कर्म निष्काम बुद्धिसे करते रहनेसे, व्यापक
अर्थमें, यह एक बड़ा भारी यज्ञही हो जाता है और फिर इस यज्ञके लिये जो
कर्म किया जाता है, वह बंधन नहीं होता (गीता ४. २३)। किंतु सभी काम
निष्काम बुद्धिसे करनेके कारण यज्ञसे जो स्वर्गप्राप्तिरूप बंधक फल मिलनेवाला
था, वहभी नहीं मिलता; और ये सब कर्म मोक्षके आड़े आ नहीं सकते। सारांश,
मीमांसकोंका कर्मकांड यदि गीतामें कायम रखा गया हो, तोभी वह इसी रीतिसे
कायम रखा गया है, कि उससे स्वर्गका आना-जाना छूट जाता है और सभी कर्म
निष्काम बुद्धिसे करनेके कारण अंतमें मोक्षप्राप्ति हुए बिना नहीं रहती। ध्यान
रखना चाहिये, कि मीमांसकोंके कर्ममार्ग और गीताके कर्मयोगमें यही महत्त्वका
भेद है - दोनों एक नहीं हैं।
यहाँ बतला दिया, कि भगवद्गीतामें प्रवृत्ति-प्रधान भागवत-धर्म या कर्मयोगही
प्रतिपाद्य है, और इस कर्मयोगमें तथा मीमांसकोंके कर्मकांडमें कौनसा भेद है। अब
तात्त्विक दृष्टिसे इस बातका थोड़ा-सा विचार करते हैं, कि गीताके कर्मयोगमें
और ज्ञानकांडको लेकर स्मृतिकारोंकी वर्णन की हुई आश्रम-व्यवस्थामें क्या भेद
है। यह भेद बहुतही सूक्ष्म है, और सच पूछो तो इसके विषयमें वाद करनेका
कारणभी नहीं है। दोनों पक्ष मानते हैं, कि ज्ञानप्राप्ति होनेतक चित्तकी शुद्धिके लिये
प्रथम दो आश्रमोंके (ब्रह्मचारी और गृहस्थ) कृत्य सभीको करने चाहिये। मतभेद
सिर्फ़ इतनाही है, कि पूर्ण ज्ञान हो चुकनेपर कर्म करें या संन्यास ले लें ? संभव है,
कई लोग यह समझें, कि सदा ऐसे ज्ञानी पुरुष किसी समाजमें थोड़ेही रहेंगे ? इसलिये
इन थोड़े-से ज्ञानी पुरुषोंका कर्म करना या न करना एकही-सा है। इस विषयमें विशेष
चर्चा करनेकी आवश्यकता नहीं। परंतु यह समझ ठीक नहीं। क्योंकि ज्ञानी पुरुषके
बर्तावको और लोग प्रमाण मानते हैं। और अपने अंतिम साध्यके अनुसारही बर्ताव
करनेकी मनुष्य पहलेसे आदत डालता है, इसलिये लौकिक दृष्टिसे यह प्रश्न अत्यंत
महत्त्वका हो जाता है, कि "ज्ञानी पुरुषको क्या करना चाहिये ?" स्मृति-ग्रंथोंमें तो