श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
by लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
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Read in contextऔर उत्तम मार्ग है । तथापि यह लोकसंग्रहभी फलाशा रखकर न करें । क्योंकि, लोक-
संग्रहकीही क्यो न हो, पर फलाशा रखनेसे कर्म यदि निष्फल हो जाय, तो दुःख हुए
बिना न रहेगा । इसीसे मैं लोकसंग्रह करूँगा इस अभिमान या फलाशाकी बुद्धिको
मनमें न रखकर लोकसंग्रहभी केवल कर्तव्य बुद्धिसेही करना पड़ता है । इसलिये
गीतामें यह नही कहा, कि 'लोकसंग्रहार्थ' अर्थात् लोकसंग्रहस्वरूप फल पानेके लिये
तुझे कर्म करने चाहिये । किंतु यह कहा है, कि लोकसंग्रहकी ओर दृष्टि देकर
( संपश्यन् ) तुझे कर्म करने चाहिये- “लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् ” (गीता
३.२०) । इस प्रकार गीतामें जो जरा लंबी-चौड़ी शब्दयोजना की गई है, उसका
रहस्यभी वही है; जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। लोकसंग्रह सचमुच
महत्त्वपूर्ण कर्तव्य हैही; पर यह न भूलना चाहिये, कि इसके पहले श्लोकमें (गीता
३.१९) अनासक्त बुद्धिसे कर्म करनेका भगवानने अर्जुनको जो उपदेश दिया है,
वह लोकसंग्रहके लियेभी उपयुक्त है ।
ज्ञान और कर्मका जो विरोध है, वह ज्ञान और काम्य-कर्मोंका है । ज्ञान और
निष्काम कर्मोंमें आध्यात्मिक दृष्टिसेभी कुछ विरोध नहीं है । कर्म अपरिहार्य हैं;
और लोकसंग्रहकी दृष्टिसे उनकी आवश्यकताभी बहुत है, इसलिये ज्ञानी पुरुषको,
जीवनपर्यंत निस्संग बुद्धिसे यथाधिकार चातुर्वर्ण्यके कर्मही करते रहना चाहिये-
यही बात शास्त्रीय युक्ति-प्रयुक्तियोंसे सिद्ध है और यदि गीताकाभी यही इत्यर्थ है,
तो मनमें यह शंका सहजही होती है, कि वैदिक धर्मके स्मृति-ग्रंथोंमें वर्णित चार
आश्रमोंमेंसे संन्यास आश्रमकी क्या दशा होगी ? मनु आदि सब स्मृतियोंमें ब्रह्मचारी
गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी- ये चार आश्रम बतलाकर कहा है, कि अध्ययन,
यज्ञयाग, दान या चातुर्वर्ण्य-धर्मके अनुसार प्राप्त अन्य कर्मोंके शास्त्रोक्त आचरण
द्वारा पहले तीन आश्रमोंमें धीरे धीरे चित्तकी शुद्धि हो जानेपर अंतमें समस्त
कर्मोंको स्वरूपतः छोड़ देना चाहिये, तथा संन्यास लेकर मोक्ष प्राप्त करना
चाहिये (मनु. ६. १, ३३-३७) । इससे सब स्मृतिकारोंका यह अभिप्राय प्रकट
होता है, कि यज्ञयाग और दान प्रभृति कर्म गृहस्थाश्रममें यद्यपि विहित हैं, तथापि
वे सर्व चित्तकी शुद्धिके लिये हैं-अर्थात् उनका यही उद्देश्य है, कि विषयासक्ति या
स्वार्थपरायण बुद्धि छूटकर परोपकार-बुद्धि इतनी बढ़ जावे, कि सब प्राणियोंमें
एकही आत्माको पहचाननेकी शक्ति प्राप्त हो जाय; और यह स्थिति प्राप्त होनेपर,
मोक्षकी प्राप्तिके लिये अंतमें सब कर्मोंका स्वरूपतः त्यागकर संन्यासाश्रमही लेना
चाहिये । श्रीशंकराचार्यने कलियुगमें जिस संन्यास-धर्मकी स्थापना की, वह मार्ग यही
है; और स्मार्त-मार्गवाले कालिदासनेभी रघुवंशके आरंभमें-
शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् ।
वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥
"बालपनमें अभ्यास ( ब्रह्मचर्य ) करनेवाले, तरुणावस्था में विषयोपभोगरूपी संसार