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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

by लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

DevanagariHindipublished956 pages

Page 250 of 956

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Page 250

अध्यात्म २०३
वह प्रकृति अव्यक्त भलेही हो । सृष्टिके उत्पत्तिक्रमके विषयमें सांख्योंके सिद्धान्त
गीताकोभी मान्य हैं। इसलिये उनकी निश्चित परिभाषामें कुछ अदलाबदल न कर,
उन्हींके शब्दोंमें क्षर-अक्षर या व्यक्त-अव्यक्त-सृष्टिका वर्णन गीतामें किया गया है।
परंतु स्मरण रहे, कि इस वर्णनसे प्रकृति और पुरुषके परे जो तीसरा उत्तम पुरुष
है, उसके सर्वशक्तित्वमें कुछभी बाधा नहीं होने पाती। इसका परिणाम यह हुआ है,
कि जहाँ भगवद्गीतामें परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन किया गया है, वहाँ सांख्य और
वेदान्तके मतान्तरका संदेह मिटानेके लिये (सांख्य) अव्यक्तकेभी परेका अव्यक्त
और (सांख्य) अक्षरसेभी परेका अक्षर, इस प्रकारके शब्दोंका उपयोग करना
पड़ा है। उदाहरणार्थ, इस प्रकरणके आरंभमें जो श्लोक दिया गया है, उसे देखो।
सारांश, गीता पढ़ते समय इस बातका सदा ध्यान रखना चाहिये, कि 'अव्यक्त' और
'अक्षर' ये दोनों शब्द कभी सांख्योंकी प्रकृतिके लिये और कभी वेदान्तियोंके
परब्रह्मके लिये अर्थात् दो प्रकारसे - गीतामें प्रयुक्त हुए हैं। वेदान्तकी दृष्टिसे,
सांख्योंकी अव्यक्त प्रकृतिकेभी परेका दूसरा अव्यक्त तत्त्व जगतका मूलही है।
जगत्के आदितत्त्वके विषयमें सांख्य और वेदान्तमें उपर्युक्त भेद है। आगे इस
विषयका विवरण किया जायगा, कि इसी भेदसे अध्यात्मशास्त्रप्रतिपादित मोक्ष-
स्वरूपभी सांख्योंके मोक्षस्वरूपसे कैसे भिन्न हो गया है।
सांख्योंके द्वैत - प्रकृति और पुरुष - को न मानकर, जब यह मान लिया गया,
कि इस जगतकी जड़में परमेश्वररूपी अथवा पुरुषोत्तमरूपी एक तीसराही नित्य
तत्त्व है; और प्रकृति तथा पुरुष दोनों उसकी विभूतियाँ हैं; तब सहजही यह
प्रश्न उत्पन्न होता है, कि उस तीसरे मूलभूत तत्त्वका स्वरूप क्या है: और प्रकृति
तथा पुरुषसे उसका कौन-सा संबंध है ? प्रकृति, पुरुष और परमेश्वर इसी त्रयीको
अध्यात्मशास्त्रमें क्रमसे जगत्, जीव और परब्रह्म कहते हैं, और इन तीनों वस्तुओंके
स्वरूप तथा इनके पारस्परिक संबंधका निर्णय करनाही वेदान्तशास्त्रका प्रधान कार्य
है। एवं उपनिषदोंमेंभी सर्वत्र यही चर्चा की गई है। परंतु सब वेदान्तियोंका मत इस
त्रयीके विषयमें एक नहीं है। कोई कहते हैं, कि ये तीनों पदार्थ मूलमें एकही हैं, और
कोई यह मानते हैं, कि जीव और जगत् परमेश्वरसे मूलहीमें थोड़े या अत्यंत भिन्न
हैं। इसीसे वेदान्तियोंमें अद्वैती, विशिष्टाद्वैती, और द्वैती इस प्रकार भेद उत्पन्न हो गये
हैं। यह सिद्धान्त सब लोगोंको एक-सा ग्राह्य है, कि जीव और जगतके सारे व्यवहार
परमेश्वरकी इच्छासे होते हैं। परंतु कुछ लोग तो मानते हैं,' कि जीव, जगत् और
परब्रह्म, इन तीनोंका मूलस्वरूप आकाशके समान एकरूप और अखंडित है, तथा
दूसरे वेदान्ती कहते हैं, कि जड़ और चैतन्यका एक होना संभव नहीं। अतएव अनार
या दाड़िमके फलमें यद्यपि अनेक दाने होते हैं, तोभी उससे जैसे फलकी एकता नष्ट नहीं
होती, वैसेही जीव और जगत् यद्यपि परमेश्वरमें भरे हुए हैं, तथापि ये मूलमें उससे,
भिन्न हैं; और उपनिषदोंमें जब ऐसा वर्णन आता है, कि तीनों 'एक' हैं; तब उसका