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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

by लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

DevanagariHindipublished956 pages

Page 239 of 956

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Page 239

१९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
'निवाशयात्' इस दृष्टान्तसे केवल इतनाही सिद्ध होता है, कि यह शरीर सूक्ष्म है।
परंतु उससे यह नहीं मालूम होता, कि उसका आकार कितना बड़ा है। महाभारतके
सावित्री-उपाख्यानमें यह वर्णन पाया जाता है, कि सत्यवान्‌के (स्थूल) शरीरमेंसे
अंगूठेके बराबर एक पुरुषको यमराजने बाहर निकाला - "अंगुष्ठमात्रं पुरुषं
निश्चकर्ष यमो बलात्" (मभा. वन. २९७. १६) । इससे प्रतीत होता है, कि
दृष्टान्तके लियेही क्यों न हो, लिंगशरीर अंगूठेके आकारका माना जाता था।
इस बातका विवेचन हो चुका, कि यद्यपि लिंगशरीर हमारे नेत्रोंको गोचर
नहीं है, तथापि उसका अस्तित्व किन अनुमानोंसे सिद्ध हो सकता है, और उस
शरीरके घटकावयव कौनसे हैं। परंतु केवल यह कह देनाही यथेष्ट प्रतीत नहीं होता,
कि प्रकृति और पाँच स्थूल महाभूतोंके अतिरिक्त शेष अठारह तत्त्वोंके समुच्चयसे
लिंगशरीर निर्माण होता है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि जहाँ जहाँ लिंग-शरीर
रहेगा, वहाँ वहाँ यह अठारह तत्त्वोंका समुच्चय अपने अपने गुणधर्मके अनुसार
माता-पिताके स्थूलशरीरमेंसे तथा आगे स्थूलसृष्टिके अन्नसे, हस्तपाद आदि स्थूल
अवयव या स्थूल इंद्रियाँ उत्पन्न करेगा; अथवा उनका पोषण करेगा। परंतु अबतक
यह बतलाना है, कि अठारह तत्त्वोंके समुच्चयसे बना हुआ लिंगशरीर पशु, पक्षी,
मनुष्य आदि भिन्न भिन्न देह क्यों उत्पन्न करता है। सजीव सृष्टिके सचेतन तत्त्वको
सांख्यवादी 'पुरुष' कहते हैं; और सांख्यमतानुसार ये पुरुष चाहे असंख्यभी हों;
तथापि प्रत्येक पुरुष स्वभावतः उदासीन तथा अकर्ता है। इसलिये पशु-पक्षी आदि
प्राणियोंके भिन्न भिन्न शरीर उत्पन्न करनेका कर्तृत्व पुरुषके हिस्सेमें नहीं आ सकता।
वेदान्तशास्त्रमें कहा है, कि पापपुण्य आदि कर्मोंके परिणामसे ये भेद उत्पन्न हुआ
करते हैं। इस कर्म-विपाकका विवेचन आगे चलकर किया जायगा। सांख्यशास्त्रके
अनुसार कर्मको - पुरुष और प्रकृतिसे भिन्न - तीसरा तत्त्व नहीं मान सकते; और
जब कि पुरुष उदासीनही है, तब कहना पड़ता है, कि कर्म प्रकृतिके सत्त्व-रज-
तमोगुणोंकाही विकार है। लिंगशरीरमें जिन अठारह तत्त्वोंका समुच्चय है, उनमेंसे
बुद्धितत्त्व प्रधान है। इसका कारण यह है, कि बुद्धिहीसे आगे अहंकार आदि सत्रह
तत्त्व उत्पन्न होते हैं। अर्थात् जिसे वेदान्तमें कर्म कहते हैं, उसीको सांख्यशास्त्रमें
सत्त्व-रज-तम गुणोंके न्यूनाधिक परिमाणसे उत्पन्न होनेवाला बुद्धिका व्यापार,
धर्म या विकार कहते हैं। बुद्धिके इस धर्मका नाम 'भाव' है और सत्त्व-रज-तम
गुणोंके तारतम्यसे ये 'भाव' कई प्रकारके हो जाते हैं। जिस प्रकार फूलमें गंध या
कपड़ेमें रंग लिपट रहता है, उसी प्रकार लिंगशरीरमें ये भावभी लिपटे रहते हैं।
(सां. का. ४०)। इन भावोंके अनुसार, अथवा वेदान्त परिभाषा में कर्मके अनुसार,
लिंगशरीर नये नये जन्म लिया करता है; और ये जन्म लेते समय, माता-पिताओंके
शरीरोंमेंसे जिन द्रव्योंको वह आकर्षित किया करता है, उन द्रव्योंमेंभी दूसरे भाव
आ जाया करते हैं। "देवयोनि, मनुष्ययोनि, पशुयोनि तथा वृक्षयोनि" ये सब