श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
by लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
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माने गये हैं। परंतु वर्गीकरणकी उक्त भिन्नताके कारण किसीके मनमें कुछ भ्रम
न हो जाय, इसलिये ये तीनों वर्गीकरण कोष्टकके रूपमें एकत्र करके आगे दिये गये
हैं। गीताके तेरहवें अध्याय (गीता १३.५) में वर्गीकरणके झगड़ेमें न पड़ कर,
सांख्योंके पचीस तत्त्वोंका वर्णन ज्यों-का-त्यों पृथक् पृथक् किया गया है; और
इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि चाहे वर्गीकरणमें कुछ भिन्नता हो; तथापि
तत्त्वोंकी संख्या दोनों स्थानोंपर बराबरही है।
पचीस मूलतत्त्वोंका वर्गीकरण
सांख्योंका वर्गीकरण । तत्त्व । वेदान्तियोंका वर्गीकरण । गीताका वर्गीकरण
न-प्रकृति न-विकृति १ पुरुष परब्रह्मका श्रेष्ठ स्वरूप परा प्रकृति
मूल प्रकृति १ प्रकृति \ अपरा प्रकृति
१ महान् परब्रह्मका कनिष्ठ } अपरा प्रकृतिके
७ प्रकृति-विकृति १ अहंकार स्वरूप } आठ प्रकार
५ तन्मात्राएँ (आठ प्रकारका) /
१ मन \ विकार होनेके कारण \ विकार होनेके
५ बुद्धींद्रियाँ } इन सोलह तत्त्वोंको | कारण गीतामें इन
१६ विकार ५ कर्मेंद्रियाँ } वेदान्ती मूल तत्त्व | पंद्रह तत्त्वोंकी
५ महाभूत / नहीं मानते। | गणना मूल तत्त्वोंमें
२५ / नहीं की गई है।
यहाँतक इस बातका विवेचन हो चुका, कि पहले मूलसाम्यावस्थामें रहने-
वाली एकरूप अवयवरहित अव्यक्त जड़ प्रकृतिमें व्यक्तसृष्टि उत्पन्न करनेकी
अस्वयंवेद्य 'बुद्धि' कैसे प्रकट हुई; फिर उसमें 'अहंकार'से अवयवसहित विविध
समता कैसे उपजी; और इसके बाद 'गुणोंसे गुण' इस गुणपरिणामवादके अनुसार
एक ओर सात्त्विक (अर्थात् सेंद्रिय) सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह सूक्ष्म इंद्रियाँ
तथा दूसरी ओर तामस (अर्थात् निरिंद्रिय) सृष्टिकी मूलभूत पांच सूक्ष्मतन्मात्राएँ
कैसे निर्मित हुई। अब इसके बादकी सृष्टि (अर्थात् स्थूल पंचमहाभूतों या उनसे
उत्पन्न होनेवाले अन्य जड़ पदार्थोंकी) उत्पत्तिके क्रमका वर्णन किया जावेगा।
सांख्यशास्त्रमें सिर्फ़ यही कहा है, कि सूक्ष्मतन्मात्राओंसे 'स्थूल पंचमहाभूत'
अथवा 'विशेष', गुणपरिणामके कारण, उत्पन्न हुए हैं। परंतु वेदान्तशास्त्रके ग्रंथोंमें
इस विषयका अधिक विवेचन किया गया है; इसलिये प्रसंगानुसार उसकाभी
संक्षिप्त वर्णन - इस सूचनाके साथ, कि यह वेदान्तशास्त्रका मत है, सांख्योंका नहीं
- यहाँ कह देना आवश्यक जान पड़ता है। "स्थूल पृथ्वी, पानी, तेज, वायु और
आकाश" को पंचमहाभूत अथवा विशेष कहते हैं। इनका उत्पत्तिक्रम तैत्तिरी-
योपनिषद्में इस प्रकार है :- "आत्मनः आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । बायो-
रग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः ।" इत्यादि (तै. उ. २. १)-