श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| २ अक्टूबर, १८८४ | परिच्छेद ९५ | ६७१ |
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करो। तुम लोग संसार को काकविष्ठा नहीं कह सकते।
"गोस्वामी गृहस्थ हैं; इसीलिए मैं उनसे कहता हूँ, तुम्हारे यहाँ श्रीठाकुरजी की सेवा है, तुम लोग क्या संसार का त्याग करोगे - तुम लोग संसार को माया कहकर उनका अस्तित्व लोप नहीं कर सकते।
"संसारियों का जो कर्तव्य है, उस पर श्रीचैतन्यदेव ने कहा है - 'जीवों पर दया रखो, वैष्णवों की सेवा करो, उनका नाम लो।'
"केशव सेन ने कहा था - 'वे इस समय, दोनों ही करो, कह रहे हैं। एक दिन कहीं चुपचाप काट खायेंगे।' परन्तु बात ऐसी नहीं - भला मैं क्यों काटूँगा?"
मणि मल्लिक - किन्तु आप तो काटते हैं।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - क्यों? तुम जैसे के वैसे ही तो बने हो - तुम्हें त्याग करने की क्या जरूरत है?
(५)
आचार्य का कामिनी-कांचन त्याग, फिर लोकशिक्षा का अधिकार
श्रीरामकृष्ण - जिनके द्वारा वे लोक-शिक्षा देना चाहते हैं, उन्हें संसार का त्याग करना चाहिए। जो आचार्य हैं, उन्हें कामिनी और कांचन का त्याग करना चाहिए। नहीं तो उनके उपदेश लोग मानते नहीं। केवल भीतर ही त्याग के होने से काम नहीं होता। बाहर भी त्याग होना चाहिए। लोक-शिक्षा तभी हो सकती है। नहीं तो लोग सोचते हैं, ये कामिनी और कांचन का त्याग करने के लिए कह तो रहे हैं, परन्तु भीतर ये खुद उसका भोग कर रहे हैं।
"एक वैद्य ने रोगी को दवा देकर कहा, 'तुम किसी दूसरे दिन आना, भोजन-आदि की बात बता दूँगा।' उस दिन वैद्य के यहाँ राब की बहुतसी कलसियाँ भरी थीं। रोगी का घर बहुत दूर था। उसने दूसरे दिन आकर उनसे भेंट की। वैद्य ने कहा, 'खाने पीने में जरा सावधानी रखना, गुड़ खाना अच्छा नहीं।' रोगी के चले जाने पर एक आदमी ने वैद्य से पूछा, 'उसे इतनी तकलीफ आपने क्यों दी? उसी दिन कह देते कि गुड़ न खाना।' हँसकर वैद्य ने कहा, 'इसका एक खास अर्थ है। उस दिन मेरे यहाँ राब और गुड़ के बहुत से घड़े रखे हुए थे। उस दिन अगर मैं कहता तो उसको विश्वास न होता। वह सोचता, जब इन्हीं के यहाँ इतना गुड़ रखा हुआ है, तो ये जरूर कुछ न कुछ गुड़ खाया करते होंगे। अतएव गुड़ कुछ ऐसी बुरी चीज नहीं हो सकती। आज मैंने गुड़ के घड़ों को छिपा रखा है। अब उसे मेरी बात का विश्वास होगा।
"मैंने आदि-समाज के आचार्य को देखा; सुना, दूसरी या तीसरी बार उसने विवाह किया है! - लड़के सब बड़े-बड़े हो गये हैं!