श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद १५ ६६९
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे। गाना हो जाने पर विजय ने कहा, 'वे अनन्तशक्ति हैं – क्या किसी दूसरे रूप से दर्शन नहीं दे सकते? कितने आश्चर्य की बात है! लोग रेणु की रेणु जो हैं, फिर भी वे समझ बैठते हैं कि ईश्वर के सम्बन्ध में सब कुछ जान लिया।'
श्रीरामकृष्ण – कुछ गीता, भागवत और वेदान्त पढ़कर लोग सोचते हैं, हमने सब समझ लिया। चीनी के पहाड़ पर एक चींटी गयी थी। एक दाना खाने से ही उसका पेट भर गया। एक दाना और मुँह में दबाकर वह घर लौट पड़ी। जाते हुए सोच रही थी, अबकी बार आकर सारा पहाड़ उठा ले जाऊँगी! (सब हँसते हैं।)
(४)
कर्मयोग तथा मनोयोग
आज बृहस्पतिवार, २ अक्टूबर, १८८४ – आश्विन शुक्ला द्वादशी-त्रयोदशी। कल श्रीरामकृष्ण कलकत्ते में अधर के यहाँ आये हुए थे। श्रीरामकृष्ण वहाँ कीर्तनानन्द में नाचे थे।
श्रीरामकृष्ण के पास आजकल लाटू, हरीश और रामलाल रहते हैं। बाबूराम भी कभी कभी आकर रहते हैं। श्रीयुत रामलाल श्रीभवतारिणी की सेवा करते हैं। हाजरा महाशय भी हैं।
आज श्रीयुत मणिलाल मल्लिक, प्रिय मुखर्जी, उनके आत्मीय हरि, शिवपुर के एक ब्राह्मभक्त, बड़ाबाजार १२ नम्बर मल्लिक स्ट्रीट के मारवाड़ी भक्त श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए हैं। क्रमशः दक्षिणेश्वर के कई लड़के और सींती के महेन्द्र वैद्य आये। मणिलाल पुराने भक्त हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मणिलाल आदि से) – नमस्कार मन ही मन का अच्छा होता है। पैरों पर हाथ रखकर नमस्कार की क्या जरूरत है? और मन ही मन जिसे नमस्कार किया जाता है, उसे सङ्कोच भी नहीं होता।
“मेरा ही धर्म ठीक है और सब मिथ्या है; यह सब अच्छा नहीं।
“मैं देखता हूँ, वे ही सब कुछ हुए हैं – मनुष्य, प्रतिमा, शालग्राम; सब के भीतर एक ही सत्ता देखता हूँ! मैं एक को छोड़ दूसरा कुछ नहीं देखता।
“बहुत से लोग सोचते हैं, मेरा ही मत ठीक है और सब गलत हैं – हम जीते और सब हार गये। इससे, जो, बढ़ गया है, वह थोड़े के लिए अटक जाता है। तब जो पीछे पड़ा था, वह बढ़ जाता है। गोलकधाम के खेल में, बहुत कुछ बढ़ गया, परन्तु फिर पौ न पड़ा।
“हार और जीत उनके हाथ में हैं। उनका काम कुछ समझ में नहीं आता। देखो,