Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 656 of 711

Read in context
Page 656

२१ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९२ । ६३३

इसके खाने की विशेष असुविधा नहीं है।

“शायद उन लोगों के सामने मैंने बाबूराम से कहा था, नारायण के लिए और अपने लिए ये सन्देश रख दे। इसके बाद गणी की माँ और वे सब कहने लगीं - ‘नारायण अपनी माँ को नित्य प्रति यहाँ आने के लिए नाव का किराया माँगकर परेशान किया करता है।’

“मुझसे कहा आप नारायण से कहिये जिससे विवाह करे। इस बात पर मैंने कहा, ये सब भाग्य की बातें हैं। क्यों मैं ऐसी बात के लिए जोर दूँ? (सब हँसते हैं।)

“नारायण अच्छी तरह पढ़ने में जी नहीं लगाता। इस पर उसने कहा, आप कहिये, जरा अच्छी तरह पढ़े। मैंने कहा, पढ़ना रे! तब उसने कहा, जरा अच्छी तरह कहिये। (सब हँसते हैं।)

(चुनी से) “क्यों जी भला गोपाल क्यों नहीं आता?”

चुनी – उसे खून जा रहा है – आँव के साथ।

श्रीरामकृष्ण – दवा खा रहा है न?

श्रीरामकृष्ण आज स्टार थियेटर में ‘चैतन्यलीला’ नाटक देखने जायेंगे। (पहले स्टार थियेटर का अभिनय जहाँ पर होता था, वहाँ आजकल कोहिनूर थियेटर है।) महेन्द्र मुखर्जी के साथ उन्ही की गाड़ी पर चढ़कर अभिनय देखने जायेंगे। कहाँ बैठने पर अच्छी तरह दीख पड़ता है, यही बात हो रही है। किसी ने कहा, एक रुपयेवाली जगह से खूब दीख पड़ता है। राम ने कहा, ये ‘बाक्स’ से देखेंगे।

श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं। किसी किसी ने कहा, वेश्याएँ अभिनय करती है। चैतन्यदेव, निताई, इनका पार्ट वे ही करती है।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – मैं उन्हे माँ आनन्दमयी देखूँगा।

“वे चैतन्य सजकर निकली हैं तो इससे क्या हुआ? नकली फल देखिये तो यथार्थ फल की बात याद आ जाती है।

“किसी भक्त ने रास्ते पर जाते हुए देखा, कुछ बबूल के पेड़ थे। देखते ही भक्त को भावावेश हो गया। उसे यह याद आया कि इसकी लकड़ी से श्यामसुन्दर के बगीचे की कुदार के लिए अच्छा बेंट हो सकता है। उसे श्यामसुन्दर की बात याद आ गयी थी। जब किले के मैदान में मुझे बेलून दिखाने के लिए ले गये थे, तब एक साहब का लड़का पेड़ के सहारे तिरछा होकर खड़ा था। उसे देखने के साथ ही कृष्ण की उद्दीपना हो गयी और मैं समाधिमग्न हो गया।

“चैतन्यदेव मेड़गाँव से होकर जा रहे थे। सुना, गाँव की मिट्टी से खोल बनते हैं। सुनने के साथ ही उन्हें भावावेश हो गया था।

“श्रीमती (राधा) मेघ या मोरों की गरदन देख लेने पर फिर स्थिर नहीं रह सकती