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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 643 of 711

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Page 643
६२०श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ सितम्बर, १८८४

घर में हम लोग थे, उसके आंगन में रात को औरतें सोई हुई थीं। लघुशंका करने के लिए बाहर जा रहा था, उन लोगों ने कहा, पेशाब यहीं (आंगन में ही) करो।

"आकर्षण किसे कहते हैं, यह मैं वहीं समझा था। ईश्वर की लीला में योगमाया की सहायता से आकर्षण होता है, एक तरह का जादू-सा चल जाता है।"

(३)

श्रीरामकृष्ण और श्री राधिका गोस्वामी

दोनों मुखर्जी भाइयों से बातचीत करते हुए दिन के तीन बज गये। श्रीयुत राधिका गोस्वामी ने आकर प्रणाम किया। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को पहली ही बार देखा है। उम्र तीस के भीतर होंगी। गोस्वामी ने आसन ग्रहण किया।

श्रीरामकृष्ण – क्या आप लोग अद्वैत-वंश के हैं? – खानदान का गुण तो होता ही है।

"अच्छे आम के पेड़ में अच्छे ही आम लगते हैं। (सब हँसे।) खराब आम नहीं होते। केवल मिट्टी के गुण से कुछ छोटे-बड़े हो जाते हैं। आपकी क्या राय है?"

गोस्वामी – (विनयपूर्वक) – जी, मैं क्या जानूँ?

श्रीरामकृष्ण – तुम कुछ भी कहो, दूसरे आदमी क्यों छोड़ने लगे?

"ब्राह्मण में चाहे लाख दोष हों परन्तु उसे भरद्वाज गोत्र और शाण्डिल्य गोत्र का समझकर लोग उसकी पूजा करते हैं। (मास्टर से) शंखचीलवाली बात जरा सुना तो दो।"

मास्टर चुपचाप बैठे हुए हैं। यह देखकर श्रीरामकृष्ण स्वयं कह रहे हैं –

"वंश में अगर महापुरुष का जन्म हुआ हो तो वे खींच लेंगे, चाहे लाख दोष भी हों। जब गंधर्वों ने कौरवों को बाँध लिया तब युधिष्ठिर ने उन्हें मुक्त कर दिया। जिस दुर्योधन ने इतनी शत्रुता की थी, जिसके लिए युधिष्ठिर को वनवास भी सहना पड़ा, उसी को उन्होंने मुक्त कर दिया।

"इसके सिवा भेष का भी आदर किया जाता है। भेष देखकर सत्य वस्तु की उद्दीपना होती है। चैतन्य देव ने गधे को भेष पहनाकर साष्टांग प्रणाम किया था।

"शंखचील (सफेद परवाली चील) को देखकर लोग प्रणाम क्यों करते हैं? कंस जब मारने के लिए चला था तब भगवती शंखचील का रूप धारण कर उड़ गयी थीं। इसलिए अब भी जब लोग शंखचील देखते हैं, तो उसे प्रणाम करते हैं।

"चानक के पलटन के भीतर अंग्रेज को आते हुए देखकर सिपाहियों ने सलाम किया। कुँवर सिंह ने मुझे समझाया कि अंग्रेजों का राज्य है, इसीलिए अंग्रेजों को सलामी दी जाती है।

"शाक्तों का तन्त्र मत है। वैष्णवों का पुराण मत। वैष्णव जो साधना करते हैं उसके