श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| ३ जुलाई, १८८४ | परिच्छेद ८६ | ५६७ |
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श्रीरामकृष्ण – बड़ा बुद्धिमान है न?
मास्टर – जी हाँ, उसमें खूब पाण्डित्य है।
श्रीरामकृष्ण – गीता का मत है, जिसे बहुत से लोग मानते, जानते हैं, उसके भीतर ईश्वर की शक्ति है। परन्तु शशधर के कुछ काम बाकी हैं।
“सूखे पाण्डित्य से क्या होगा? कुछ तपस्या चाहिए – कुछ साधना चाहिए।
“गौरी पण्डित ने साधना की थी। जब वह स्तुतियाँ पढ़ता था – ॐ निरालम्बो लम्बोदर – तब अन्य पण्डित केंचुए हो जाते थे।
“नारायण शास्त्री भी केवल पण्डित नहीं, उसने भी साधना की है।
“नारायण शास्त्री पचीस साल तक एक ही बहाव में पड़ा था। सात साल तक सिर्फ न्याय पढ़ा था। फिर भी 'हर हर' कहते ही भावमग्न हो जाता था। जयपुर के महाराजा ने उसे अपना सभापण्डित बनाना चाहा था। उसने वह काम मंजूर नहीं किया। दक्षिणेश्वर में प्रायः आकर रहता था। वशिष्ठाश्रम जाने की उसकी बड़ी इच्छा थी। तपस्या करने के लिए जाने की बात प्रायः मुझसे कहा करता था। मैंने उसे वहाँ जाने के लिए मना किया, तब उसने कहा, किसी दिन दम खतम हो जायेगा, फिर साधना कब करूँगा? जब उसने हठ पकड़ा, तब मैंने कह दिया – अच्छा जाओ।
“सुनता हूँ, कोई कोई कहते हैं, नारायण शास्त्री का देहान्त हो गया है। तपस्या करते समय किसी भैरव ने चपत मारी थी। कोई कोई कहते हैं, वे बचे हुए हैं, अभी उनको रेल पर सवार कराके हम आ रहे हैं।
“केशव सेन को देखने से पहले नारायण शास्त्री से मैंने कहा, तुम एक बार जाकर उन्हें देख आओ और मुझे बताओ कि वे कैसे आदमी हैं। वह देखकर जब आया, तब कहा, वह जप करके सिद्ध हो गया है। नारायण ज्योतिष जानता था। उसने कहा, 'केशव सेन भाग्य का बड़ा जबरदस्त है। मैंने उससे संस्कृत में बातचीत की थी। वह भाषा (बंगाली) बोलता था।
“तब मैं हृदय को साथ लेकर बेलघर के बगीचे में केशव से मिला। उसे देखते ही मैंने कहा था, 'इन्हीं की पूँछ गिर गयी है – ये पानी में भी रह सकते हैं और जमीन पर भी।'”
श्रीरामकृष्ण पूँछ गिरने की लोकोक्ति के द्वारा कह रहे हैं कि यही केशव हैं जो संसार में भी रहते हैं और ईश्वर में भी।
“मेरी परीक्षा लेने के लिए तीन ब्राह्मसमाजियों को केशव ने काली-मन्दिर भेजा। उनमें प्रसन्न भी था। बात यह थी कि वे रात-दिन मुझे देखेंगे और केशव के पास खबर भेजते रहेंगे। मेरे घर में रात को सोये। बस 'दयामय' 'दयामय' करते थे और मुझसे कहते थे, 'तुम केशव बाबू की पैरवी करो तो तुम्हारे लिए अच्छा होगा।' मैंने कहा, 'मैं साकार